कुसुम का धागा

मधु चौधरी, लेखिका, बोरीवली (मुंबई)

सुबह की चाय का कप हाथ में लिए मैं अख़बार पढ़ रही थी कि एक खबर ने जैसे दिल को भीतर तक हिला दिया इंदौर में बस में छूटा नवजात शिशु, मां-बाप फरार.
खबर छोटी थी, पर असर बड़ा. कुछ पंक्तियों में लिखी उस घटना के पीछे जाने कितनी कहानियां दबी थीं.
लिखा थाएक दंपत्ति बस में सवार हुए, गोद में एक नन्हा सा बच्चा था, मुश्किल से पंद्रह दिन का. थोड़ी देर बाद वे बोले कि कुछ सामान लेना है, बस से उतर गए. बस चली नहीं, इंतज़ार किया गया, पर वे लौटकर कभी नहीं आए. जब कंडक्टर ने बच्चे को अकेला देखा, तो पुलिस को खबर दी. बच्चा अब सरकारी संरक्षण में है.
मेरे हाथ से कप कांप उठा. अचानक मुझे कुसुम याद आ गई वही कुसुम जो हर मंगलवार 20 किलोमीटर पैदल चलकर पहाड़ी वाले मंदिर पहुँचती थी. बारिश, धूप, आंधी, ठंडीकुछ भी उसे रोक नहीं पाता था. लाल साड़ी में, माथे पर बड़ी सी बिंदी, आँखों में आशा की नमी.
हर बार मंदिर की रेलिंग पर एक और मन्नत का धागा बाँधती. हे हनुमान जी, मुझे भी एक औलाद दे दो, मेरी गोद भी भर दो. मैंने उसे कई बार देखा थामंदिर की सीढ़ियों पर सिर झुकाए, कभी फूलों से भरी थाली में आंसू टपकाते हुए, तो कभी बच्चों को खेलते देख चुपचाप मुस्कराते हुए. उसकी आँखों में मातृत्व की प्यास थी.एक ऐसी प्यास जो शब्दों से परे थी और अब इस खबर को पढ़ते हुए, मुझे वही कुसुम याद आ रही थी.
कितनी अजीब बात हैएक औरत अपनी सूनी गोद भरने के लिए भगवान से मिन्नतें कर रही है, और दूसरी औरत अपनी गोद का फल, अपने ही बच्चे को, रास्ते में छोड़ जा रही है. दोनों ही औरतें हैं पर दोनों की कहानियां बिल्कुल उलट हैं. एक के पास ममता है पर बच्चा नहीं, दूसरी के पास बच्चा है पर शायद हालात नहीं. सोचती हूँ, क्या सचमुच ये सिर्फ मजबूरी है?
या फिर वह माँ अपने हालातों से हार गई होगी. गरीबी, अकेलापन, समाज का डर, या किसी बेवजह अपराध बोध से? क्या पता, उसने बच्चे को छोड़ते वक्त आख़िरी बार उसे चूमा भी हो, आँसू पोंछे हों और धीरे से कहा हो बेटा, किसी अच्छे हाथों में चले जाना.
चाय ठंडी हो चुकी थी, पर भीतर एक लावा सुलग रहा था.
कुसुम का चेहरा, वो मंदिर का मन्नत का धागा, और अख़बार की वह छोटी सी खबर तीनों मिलकर जैसे एक सवाल बन गए थे मेरे भीतर.क्या भगवान सिर्फ मन्नतें सुनते हैं? या कभी उन छोड़े गए बच्चों की सिसकियां भी उनकी कानों तक पहुँचती हैं? उस दिन समझ आई. माँ होना सिर्फ बच्चा जनना नहीं है, माँ होना ममता के दर्द को जीना है. और वह दर्द, चाहे कुसुम की आँखों में हो या उस नवजात की माँ की आँखों में दोनों ही एक समान गीले हैं.

9 thoughts on “कुसुम का धागा

  1. Ye ghatnayen aage aur bhi badhengi aaj ki nayi peedhi jahan live in main rehna to chahti hai par bacche ki jimmedari nahi lena chahati

    1. सिर्फ बच्चों की नहीं वह रिश्ते की जिम्मेदारी भी नहीं लेना चाहती । लेकिन इसका दोष सिर्फ महिला का नहीं , पुरुष भी इसमें बराबर का भागीदार है।

  2. Really sad n heart touching story.No fault of 15 days old child,who was left ruthlessly. We cannot blame the parents also as we r unaware of reality. God is great,l am sure that he will definitely do some good for the child.

  3. बहुत ही मार्मिक रचना मधु। दिल को छू लेने वाली एवं आखौं मैं पानी भरने वाली।

  4. आभार, संपादक जी का , जो मेरी रचनाओं में सुधार कर उन्हें आप सबके सामने प्रस्तुत करने लायक बना देतें है।

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