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औकात

रंजना किशोर, प्रसिद्ध लेखिका, मयूर विहार, नई दिल्ली

राधिया आज ज़रूरत से कुछ ज़्यादा ही ख़ुश है, उसके तो पाँव ही ज़मीन पर नहीं पड़ रहे हैं। जब से उसकी बस्ती से मैडम जी भाषण देकर गई हैं, उसकी ख़ुशी उसके पोर-पोर से छलक रही है। कितनी ही बातें हुईं. नारी स्वतंत्रता, स्त्री समानता की, मर्दों से बराबरी, कदम से कदम मिलाकर चलने की। कितनी ही बातें, कुछ बातें तो राधिया समझ गई, परंतु कुछ बातें उसकी पल्ले ही नहीं पड़ीं, बिल्कुल सर के ऊपर से गुज़र गईं।

मोटे तौर पर उसे जो समझ में आया, उससे यही निष्कर्ष निकला कि मैडम जी उन लोगों का भला ही चाहती हैं। इस सड़ी-गली बस्ती में फैली बीमारियों से छुटकारा दिलाना चाहती हैं। दवा-दारू का इंतज़ाम करना चाहती हैं, मर्दों की मनमानी से छुटकारा दिलाना चाहती हैं। अगर नहीं चाहतीं तो इतना सब कुछ मुफ़्त में क्यों देकर जातीं? राशन-पानी, दवा-दारू, शैम्पू, साबुन,साफ़-सफ़ाई का महत्व समझाकर गई हैं।

‘चलो कोई तो आगे आया, कोई तो हम ग़रीबों के लिए सोचा।’ दोपहर की घटना राधिया के आँखों के सामने चलचित्र सा घूम गई। कितनी सारी मैडम जी आई थीं, गिटिर-पिटिर अंग्रेज़ी बोल रही थीं। उनमें से रेखा मैडम जी राधिया के दिल को छू गईं। बेहद सौम्य, बहुत सुंदर, रूप ऐसा कि कोई नज़र लगा जाए। गोरी इतनी कि पूछो ही मत।

राधिया का हाथ पकड़कर बात करना शुरू किया तो राधिया ने झट से अपना हाथ खींच लिया। कहीं उसकी गंदी, खुरदरी हाथों से मैडम जी गंदी न हो जाएँगी। राधिया के अति उत्साहित होने का कारण कुछ और ही था। मैडम जी ने राधिया को अपने यहाँ काम करने को कहा था। राधिया को लगा जैसे उसकी सारी परेशानी दूर हो गई, तब तक उसका पति आ गया।

“अरे, एका! तूने अभी तक खाना नहीं पकाया?” उसके चीखने से उसकी तंद्रा भंग हुई, वह वर्तमान में लौट आई। उसके चिल्लाने पर वह भी चिल्ला उठी, “देख, अब ज़्यादती चपड़-चपड़ मत कर, नहीं तो अपने मैडम जी से शिकायत कर दूँगी! और इ का! आज तू फिर पीकर आया है? अगली बार से पीकर आया तो ठेलकर बाहर कर दूँगी।”

रामाधार को समझ में नहीं आ रहा था कि राधिया को आज हुआ क्या है? उसके दारू पीकर आने पर पहले भी गुस्सा होती थी, पर आवाज़ इतनी बुलंद नहीं होती। वह एक बार कह देता, “चल, निकल मेरी खोली से,” तो दम साध लेती। बेचारी जाती भी कहाँ? तीन-तीन बच्चों को लेकर माई-बाबू तो कब के मर-मरा गए थे। ससुराल के नाम पर एक पति ही था।

कभी-कभी ज़्यादा ज़िद पर अड़ जाती तो एकाध हाथ जड़ देता। बेचारी शांत हो जाती। आज ज्योंही मुख से बिलबिलाते हुए उसने उस पर हाथ उठाना चाहा, राधिया ने कसकर उसका हाथ पकड़ लिया। सीधे आँखों में आँख डालकर धमकाया, “मुझे अब लाचार मत समझना, मेरे सर पर मैडम जी का हाथ है। अगर हाथ उठाने की कोशिश की तो सीधे हवालात की हवा खाएगा।”

उसकी आँखों में जाने क्या था, रामाधार सहम गया, चुपचाप बैठ गया। राधिया ने आग उगलते हुए रोटी बनाकर अचार के साथ रखी। खाना खाते पति को दिन की सारी घटना विस्तार से बताई किस तरह मैडम जी सब आकर बस्ती में राशन-पानी बाँटकर गई हैं, उसे कल से काम पर भी बुलाया है। रामाधार को उसकी तेज़ी अब जाकर समझ में आई। चुपचाप सो गया, पर राधिया की आँखों में नींद का नामोनिशान न था।राधिया की आँखों से नींद ग़ायब है। खुली आँखों में रंगीन सपने तैर रहे हैं. वे सपने जो वह बचपन से देख रही है। साफ़-सुथरे कपड़े पहनकर, बस्ता लेकर स्कूल जाने का सपना। वह न पढ़ पाई तो क्या हुआ, अपने बच्चों को ज़रूर स्कूल भेजेगी। अगर मैडम जी के पास नौकरों को रखने की कोठी होगी तो सिफ़ारिश करेगी कि उसे दे दें।

झुग्गी-झोपड़ी से बाहर निकलने के लिए वह कब से छटपटा रही है। आए दिन दंगे-पुलिस… यहाँ दिन क्या, रात क्या, सब बराबर है। औरतें काम पर जाती हैं और सारे मर्द दिन में ही दारू पीकर जुए के अड्डे पर बैठ जाते हैं। अगर कोई हार गया और उसके पास पैसे नहीं हैं तो अपनी बेटी या जोरू को ही गिरवी रख देता है, भले ही वो उसका बलात्कार करे। कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। ये सब रोज़ का मामला है। यहाँ रोटी आसानी से नहीं मिलती, लेकिन देह (स्त्री) आसानी से मिल जाती है। साथ ही टेलीविज़न ने देह को और नज़दीक ला दिया है। जिनके पास दो जून की रोटी नहीं जुटती, वो भी टेलीविज़न का जुगाड़ कर ही लेते हैं।

खुली आँखों से सुनहरे भविष्य को संजोने लगी। पता नहीं कितनी बड़ी होगी मैडम जी की कोठी! जो भी हो, मन लगाकर साफ़-सफ़ाई का काम करेगी। अपने बच्चों का प्राइवेट स्कूल में नाम लिखाने की भी बात करेगी। मैडम जी ने अगर कोठी के पीछे नौकरों के लिए बने घर में रहने को कहा तो अपना झुग्गी-झोपड़ी छोड़कर वहीं आ जाएगी। वहाँ रहेगी तो रामाधार को भी मैडम जी से डर बना रहेगा। फिर देखते हैं कैसे मनमानी कर पाता है, कैसे अपना सब पैसा दारू में उड़ाता है! ढेर सारे झिलमिलाते सपने राधिया की आँखों में तैर गए। वह बस्ती के गंदे माहौल से अपने बच्चों को निकालना चाहती है। शिक्षित करना चाहती है ताकि उनकी तरह मज़दूरी नहीं करनी पड़े।

शौकीन तो वह शुरू से ही थी, साथ ही मेहनती भी। सुबह से शाम तक इस कोठी से उस कोठी का चक्कर लगाती। पैसे जोड़ती, अच्छा-ख़ासा रक़म हो जाता तो उसका पति उड़ा ले जाता दारू पीने। उसके दुःख का यही कारण था। फिर राधिया को ख़याल आया, पता नहीं मैडम जी के साहब जी कैसे होंगे। ज़रूर वह भी मैडम जी की तरह नरम दिल इंसान होंगे, तभी मैडम जी इतना सब कुछ कर पाती होंगी।

राधिया ने पूरी रात आँखों में ही निकाल दी। रात भर जगने के बावजूद उसकी चाल में ग़ज़ब की फ़ुर्ती है। जल्दी-जल्दी रोटी-सब्जी बनाई, मल-मल कर नहाई, जैसे अपने काले रंग को आज उतार ही डालेगी। फिर अच्छी सी साड़ी बाँधी, बटुए में कागज़ पर लिखा हुआ मैडम जी का पता रखकर चल पड़ी।

सामने विशाल सी कोठी, करीने से सजे पौधे, लॉन पर पड़ी क़ीमती फ़र्नीचर व झूले मैडम जी की विलासिता की दास्ताँ बयाँ कर रही थी। माली से घर का रास्ता पूछकर अंदर प्रवेश किया। भौंचक्की रह गई राधिया, किसी महल से कम नहीं था। पूरा घर मैडम जी के सुख का बयाँ कर रहा था, परंतु मैडम जी कहीं दिखाई नहीं दीं। एक उसी के जैसी काम करने वाली दिखी। उसने मैडम जी का पता दिखाकर मिलवाने को कहा।उसने उसे ऊपर से नीचे घूरा “मैडम जी तुझे काम समझाएंगी? चल, मैं बताती हूँ। पूरे घर की सफ़ाई कर। झाड़ू उठा और लग जा।” फिर उसे कुछ याद आया। “चल, पहले खाने के कमरे की सफ़ाई कर।” डाइनिंग टेबल जैसे युद्ध का अखाड़ा बना हुआ था। क़ीमती प्लेटें, ग्लास टूटे पड़े थे।

उसने दूसरी कामवाली से पूछा, “इतने सारे बर्तन किसने तोड़े?” “ये सब सवाल करने का नहीं है, सिर्फ़ अपना काम कर।” किसी तरह घंटा लगाकर सारे टूटे बर्तन समेटे, सफ़ाई किया। फिर बेडरूम की तरफ़ बढ़ने लगी। जैसे ही दरवाज़े तक पहुँची, उसके पाँव बर्फ़ की तरह जम गए।मैडम जी के पति का एक झन्नाटेदार थप्पड़ मैडम जी के गाल पर पड़ा। “साली! मेरे दोस्तों के सामने नौटंकी करती है? मुझे नेतागिरी दिखाती है? मेरी बिल्ली मुझसे ही म्याऊँ! चुपचाप अपनी औक़ात में रहा कर। मेरे दोस्तों के सामने जो बेइज़्ज़ती हुई है, उसका बदला मैं लेकर रहूँगा।” लात-घूंसों की बरसात करता रहा, मैडम जी कराहती रहीं।

राधिया उल्टे पाँव भागी, भागते-भागते उसकी साँसें फूलने लगीं। थोड़ा रुक कर साँस लेने लगी। उसे समझ में आ गया, औरत चाहे बँगले में रहे या झुग्गी-झोपड़ी में, पढ़ी-लिखी हो या अनपढ़, सुंदर हो या कुरूप, सबकी औक़ात एक ही होती है। उसे अपनी झुग्गी-झोपड़ी की याद आने लगी। कदम तेज़ी से बढ़ने लगे।

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