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कासे कहूं

घरेलू हिंसा की मार झेलती मालती अपने दर्द को सहजता से बयान कर देती है, जबकि उसकी मालकिन मिसेज सुजैन अपने ही जख्म छुपाए बैठी हैं। कहानी निम्न वर्ग और उच्च वर्ग के बीच पनपती एक समान पीड़ा को उजागर करती है. जहां मार खाने की आदत समाज के नजरिए से तय होती है, लेकिन दर्द हर औरत का एक-सा होता है।

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औकात

कहानी राधिया नाम की झुग्गी बस्ती में रहने वाली एक स्त्री की है, जो एक समाजसेवी “मैडम जी” से मिलकर नई उम्मीदों से भर जाती है। उसे लगता है कि अब उसका जीवन बदल जाएगा . उसे नौकरी मिलेगी, सम्मान मिलेगा, और अपने बच्चों को शिक्षित कर सकेगी। पर जब वह काम के लिए मैडम जी के घर पहुँचती है, तो देखती है कि वही “मैडम जी” अपने पति के अत्याचार का शिकार हैं। यह दृश्य राधिया की सारी कल्पनाओं को तोड़ देता है। उसे एहसास होता है कि औरत चाहे अमीर हो या गरीब, उसके दर्द और संघर्ष एक जैसे हैं।

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औषध या टोना

“ज्ञान जब अज्ञान में डूब जाए तो टोना कहलाता है…
पर समझो तो वही औषध है, वही विद्या।” गाँव के लोग जिन शब्दों को मंत्र समझते थे, वे दरअसल उपचार थे और जिस औरत को ‘डायन’ कहा गया, वही जीवन लौटाने वाली वैद्य निकली। विश्वास और अंधविश्वास की पतली सरहद उस रात फिर धुंधली हो गई।

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