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भ्रम : एक म्यान दो तलवारें

मधु चौधरी, लेखिका, बोरीवली (मुंबई)

​गोल चेहरा, गालों पर चेचक के कुछ हल्के दाग और माथे पर एक बड़ी सी लाल बिंदी। जब भी बात करने के लिए मुँह खोलतीं, तो पूरी बत्तीसी एक साथ चमक उठती। हाथ में पर्स लटकाए, साड़ी का पल्लू संभाले जब वह निकलती थीं, तो एक अलग ही आभा होती थी। वह थीं – पांडे आंटी, जो एक स्कूल में शिक्षिका थीं।
​पूरी कॉलोनी उन्हें “पांडे आंटी” कहकर बुलाती थी। स्वभाव से हंसमुख, कभी किसी बात का बुरा नहीं मानती थीं। शादी के कई सालों बाद भी औलाद के सुख से वंचित थीं, फिर भी हृदय विशाल था। मेरा घर कॉलोनी की शुरुआत में ही था, तो आते-जाते अक्सर मेरी मम्मी और चाची के पास रुक जाया करती थीं। अपनी मध्य प्रदेश वाली बोली में, जिसे वह मारवाड़ी लहजे में ढालने की कोशिश करतीं, पूछती – “का भाभी जी, गाजर का हलवा बनाई रही का?”
​यह बात आज से लगभग 35-40 साल पुरानी है।
​अचानक औरतों की मंडली में यह खबर आग की तरह फैली कि पांडे आंटी ने अपने पति के लिए ‘नई दुल्हन’ लाने का विचार किया है। सुनकर सभी औरतों ने दाँतों तले उंगली दबा ली। कानाफूसी शुरू हो गई – “मत मारी गई है पांडे भाभीजी की! आपणां हाथा, आपणें पगां पे कुल्हाड़ी मारे है।” (अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है।)
​कहावतों का दौर चल पड़ा। कोई कहता – “एक म्याण में दो तलवार ना खट सके।”
सुनने में यह भी आया कि पांडे जी दूसरी शादी के लिए कतई राजी न थे, लेकिन पांडे आंटी ने उनकी एक न सुनी। एक बार मैंने मम्मी और पांडे आंटी को बात करते सुना था:
​मम्मी ने समझाया -“गोद ले लेना था पांडे भाभीजी – सौत क्यों ला रही हो?”
पांडे आंटी ने तपाक से कहा – “भाभी जी, गोद लिया बच्चा पांडे जी का ना होवेगा। हम तो पांडे जी का अपना खून, उनका बच्चा चाहवे हैं।”
​पांडे आंटी को शायद यह भ्रम था- कि मैं आदर्श पत्नी बनकर पति को संतान का सुख दूँगी, तो वह मुझे सर-आँखों पर बैठाएंगे। उन्हें लगा कि बच्चा होने के बाद नई दुल्हन तो बस एक जरिया बनकर रह जाएगी और घर पर राज ‘बड़ी मालकिन’ यानी उनका ही चलेगा। पढ़ी-लिखी होकर भी वह यह नहीं समझ पाईं कि “ऐसा भी होवे है कहीं?”
​शायद उनका अपना मातृत्व बच्चे के लिए इतना तरस रहा था कि उन्हें सौत का डंक नज़र नहीं आया। उन्हें लगा कि इससे बच्चे की कमी भी पूरी हो जाएगी और वह ‘पटरानी’ बनकर राज भी करेंगी।
​आखिरकार, लाख समझाने के बावजूद पांडे आंटी ने पांडे जी की शादी करवा ही दी। अब एक घर में पांडे जी और दो पत्नियां ! कालोनी वालों ने नाम रख दिया – ‘बड़ी’ और ‘छोटी’। और पांडे जी हो गए – ‘डबल पांडे’। हम बच्चे थे, हमें ‘डबल पांडे’ सुनकर बहुत हंसी आती थी। सोचते थे, बेचारे दो-दो लुगाईयों को कैसे संभालते होंगे?
​समय का चक्र चला। शुरू में पांडे आंटी का रुबाब खूब बढ़ा। उन्हें गर्व से कहते सुना गया – ” पांडे जी तो
नई दुल्हन के साथ कमरे में जाना ही नहीं चाह रहे थे । हम ही जबरदस्ती छोड़कर आए ।‌”

वह “छोटी ” से घर का सारा काम करवातीं और स्वयं अपनी नौकरी संभालतीं। जल्द ही वह दिन भी आ गया, जिसकी प्रतीक्षा में पांडे आंटी ने अपने ही हाथों ” पति की सेज ” सजाई थी।” छोटी” गर्भवती हुई और “बड़ी” ने खुशी-खुशी उसका जापा कराया। वह फूले न समाती थीं कि घर में वारिस आ रहा है।
​धीरे-धीरे बच्चा बड़ा होने लगा। घर के सारे काम “छोटी” के जिम्मे थे और बाहर के सब काम “बड़ी “के। लेकिन समय बीतने के साथ छोटी ने भी हिम्मत जुटाना शुरू किया। वह घर से बाहर निकलती, बड़ी को “दीदी” कहती, लेकिन दबी जुबान में पड़ोसियों को अपनी पीड़ा बताने लगी। सच यह था कि घर में “बड़ी ” का हुक्म चलता था और “छोटी ” की हैसियत महज़ एक नौकरानी जैसी थी। पांडे जी चाहकर भी कुछ नहीं कह पाते थे।
​फिर घर में झगड़े बढ़ने लगे। और एक दिन, जो नहीं होना था, वही हुआ। सुनने में आया कि रोज-रोज की किच-किच से तंग आकर पांडे जी ने बड़ी पर हाथ उठा दिया।
घर छोटे थे, दीवारें पतली थीं, आवाज़ बाहर आनी ही थी। सबको बहुत बुरा लगा। लेकिन बाद में कड़वा सच बाहर आया – पांडे आंटी अक्सर छोटी-छोटी बातों पर ‘छोटी’ को मारा करती थीं। पति का वो थप्पड़ दरअसल इतने सालों के दबे हुए गुबार का नतीजा था।

​उस थप्पड़ ने केवल पांडे आंटी के गाल पर ही चोट नहीं की थी, बल्कि उनके उस भ्रम को भी चकनाचूर कर दिया था कि वह उस घर की ‘मालकिन’ हैं। जिस ‘खून’ और ‘वंश’ की खातिर उन्होंने अपने ही हाथों सौत को घर में पनाह दी थी, आज उसी परिवार में उनके लिए कोई जगह नहीं बची थी।

​सुना है कि पास ही एक छोटे से कमरे के किराए के मकान में वह रहने लगी थीं। स्कूल जातीं, वही बड़ी बिंदी लगातीं, लेकिन अब न वह हंसी थी और न ही बत्तीसी दिखाई देती थी।
​ पांडे आंटी अपना सब कुछ दांव पर लगाकर , सब कुछ हार गई थीं।


आज सोचती हूं कि अगर पांडे आंटी नाम ने बच्चा गोद लिया होता तो ? छोटी कहां गलत थी ? पांडे जी को क्या करना चाहिए था ? क्या वह एक पत्नी को खुश करने के लिए दूसरी पत्नी के साथ अन्याय करते रहते ? मेरे सभी सवालों का जवाब मेरे अवचेतन मन ने दिया – त्याग और मूर्खता के बीच बहुत बारीक लकीर होती है। रिश्तों में जब हम प्रकृति के नियमों और मानवीय भावनाओं (ईर्ष्या, अधिकार) को नजरअंदाज कर ‘महान’ बनने की कोशिश करते हैं, तो अक्सर हाथ में केवल अकेलापन रह जाता है। पांडे आंटी ने ‘वंश’ को ‘विवाह’ और ‘प्रेम’ से ऊपर रखा, और अंततः न उन्हें पति मिला, न बच्चा, और न ही वह सम्मान जिसकी उन्हें आस थी।

6 thoughts on “भ्रम : एक म्यान दो तलवारें

    1. ये किसी के जीवन का कटु अनुभव हो सकता है… हृदय स्पर्शी कहानी 🙏

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