Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers

आखिर क्यों…?

यह कहानी एक ऐसे बुज़ुर्ग व्यक्ति की त्रासदी है जिसने जीवन भर अपने परिवार के लिए सब कुछ किया, लेकिन जीवन की साँझ में अकेलापन, उपेक्षा और भूख उसके हिस्से आई। यह लेख समाज से सवाल करता है क्या पुरुष का दर्द सचमुच अदृश्य होता है?

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दो चेहरे

आज का समाज दो चेहरों में जी रहा है एक वह जो भीतर सचमुच है और दूसरा वह जो बाहर दुनिया को दिखाया जाता है। खुशियाँ अब साझा कम और तुलना ज़्यादा बन गई हैं, जहाँ किसी की तरक्की दूसरे के भीतर जलन जगा देती है। झूठे वादों और बनावटी शान-ओ-शौकत के शोर के बीच बचपन चुपचाप वही सीख रहा है जो हम जी रहे हैं। अगर समय रहते हम नहीं संभले, तो आने वाली पीढ़ी को सच्चाई नहीं, बल्कि सिर्फ़ दिखावे से भरी एक चमकदार लेकिन खोखली दुनिया विरासत में मिलेगी।

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भ्रम : एक म्यान दो तलवारें

राम “और ” श्याम ” नाम रखूंगी भाभीजी – मेरे भी आंगन में किलकारी गूंजेगी , मेरी गोद से नहीं तो क्या हुआ ! छोटी की गोद से सही ।
बस, पांडे जी को खुश देखना चाहती हूं ।
अपने ही पति की सेज सजाई पंडिताइन ने – घर में किलकारी भी गूंजी …….
लेकिन अपने हाथों अपनी बगिया …

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भीड़

भीड़ के बीच बैठी खून से लथपथ घबराई लड़की को युवक ने अपना कोट ओढ़ाकर उठाया, और तमाशा देखती भीड़ पर गुस्से से गरज उठा.“अगर आपकी बेटी होती, तो भी ऐसे ही खड़े रहते?”

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