
रिम्मी वर्मा, प्रसिद्ध लेखिका, रांची (झारखंड)
आज अचानक शर्मा अंकल के गुजर जाने की खबर सुनकर सच में रजनी को बहुत बुरा लगा।
किन्तु उससे भी ज़्यादा बुरा उसे यह सुनकर लगा कि उनकी मौत भूख के कारण हो गई थी।
यह बात उसकी समझ में नहीं आ रही थी कि एक व्यक्ति, जो पूरे परिवार के भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी उठाता है.उसी व्यक्ति की मृत्यु का कारण डॉक्टर भूख को बताता है।
यह कैसे सच हो सकता है?…..
…..लेकिन यही सच था।
ऐसा नहीं था कि शर्मा अंकल गरीब थे या किसी छोटे-मोटे पद पर थे।
नहीं, बिल्कुल नहीं! वे तो शहर के नामी कॉलेज के प्रोफेसर रह चुके थे। रिटायर्ड होने के बाद उन्हें अच्छा-खासा पेंशन मिलता था।उनके पैसों पर ही तो उनका पूरा परिवार ऐश करता था।शर्मा आंटी अपनी नई ड्रेसेज़ के लिए मशहूर थीं। हर दिन नए-नए लुक्स में नज़र आती थीं। मंदिर भी वे ऐसे जाती थीं, मानो किसी पार्टी में जा रही हों। सच में, बिल्कुल बिंदास थीं वे।
अंकल कभी भी उन्हें किसी बात के लिए रोकते-टोकते नहीं थे।
आंटी अपना पूरा समय मंदिर और भजन-कीर्तन में बिताती थीं. कभी शनिवार को खिचड़ी, तो कभी मंगलवार को खीर का भंडारा करवाती थीं। पर हाँ, बस ध्यान नहीं रखती थीं तो अंकल का।
उन्होंने अपनी बेटियों की शादियाँ भी प्रतिष्ठित परिवारों में की थीं, फिर भी उनकी बेटियाँ अपने बच्चों की पढ़ाई के नाम पर हर महीने अंकल से पैसे लेती थीं।
बेटे का भी अच्छा-खासा कारोबार था, पर आंटी के स्वभाव के कारण वह उनके साथ नहीं रहता था।
फिर भी अंकल जितना हो सकता था, उसकी आर्थिक मदद किया करते थे। साथ ही अपने पोते की पढ़ाई-लिखाई का सारा खर्च अपनी खुशी से उठाते थे।पर उनके घरवालों ने कभी उनकी खुशी का ख्याल नहीं रखा।
वे बस अंदर-ही-अंदर घुटते रहे। समय के साथ उनका शरीर भी कमजोर होने लगा था। कान से कम सुनाई देने के कारण वे ज़ोर से बोलने लगे थे, लेकिन उनकी इस तकलीफ़ को कोई समझता नहीं था उल्टा उन्हें डाँटकर चुप करा दिया जाता था।
आंटी तो सारा दिन घर से बाहर ही रहती थीं।
बेचारे अंकल अकेले ही घर में रहते थे। कभी स्कूटी लेकर बाहर निकल जाते, तो आंटी हंगामा खड़ा कर देती थीं।
एक दिन तो हद ही हो गई. आंटी इतनी नाराज़ हुईं कि कबाड़ी वाले को बुलाकर उनकी स्कूटी ही बिकवा दी।
अब तो बेचारे अंकल पूरी तरह घर में क़ैद होकर रह गए थे। घर के लोग उनसे बात नहीं करते थे और न ही आस-पड़ोस के लोगों को उनसे बात करने देते थे। अगर वे किसी से बात कर लेते, तो उन्हें बहुत डाँटा जाता।
यहाँ तक कि घर का कोई व्यक्ति बाहर जाता, तो बाहर से दरवाज़े पर ताला लगाकर ही जाता था। गेट पर लगी ग्रिल को भी कपड़े से ढँक दिया गया था, ताकि कोई भी बाहरी व्यक्ति अंकल से बात न कर सके। पड़ोसियों ने रजनी को यह भी बताया कि अंकल को चाय तक समय पर नहीं मिलती थी।कामवाली बाई ही बस उनका थोड़ा-बहुत ख्याल रखती थी।
अगर कोई पड़ोसी उनसे बात कर लेता या उनकी पसंद का कुछ बनाकर ले आता, तो आंटी किसी न किसी बहाने उन लोगों से झगड़ने लगती थीं। इसी वजह से धीरे-धीरे लोग भी उनसे दूर होते चले गए।
इन सब बातों को सुनकर रजनी का मन वितृष्णा से भर गया।वह आई तो थी आंटी से मिलकर संवेदना व्यक्त करने, किन्तु ऐसी भयावह बातें सुनकर वह स्वयं ही बेचैन हो उठी और उल्टे पाँव अपने घर लौट आई।घर आकर भी उसकी बेचैनी कम नहीं हुई। बार-बार शर्मा अंकल का मुस्कुराता हुआ चेहरा उसकी आँखों के सामने आ जाता था।वह सोच रही थी.बच्चे तो बहुतों के नालायक और स्वार्थी निकल जाते हैं, लेकिन क्या कोई पत्नी भी ऐसी हो सकती है?
जीवन-भर साथ निभाने वाली जीवन-संगिनी ही जब इतनी क्रूर हो, तो फिर किसी और को क्या ही दोष दिया जाए?एक इंसान, जिसने अपना पूरा जीवन अपने परिवार को समर्पित कर दिया.जीवन की साँझ में वही घुट-घुट कर जीने को मजबूर हो गया। हाय! कैसी विडंबना है यह। सच यदि ऐसा जुल्म अंकल की जगह आंटी के साथ होता,तो क्या यह समाज अंकल को इतने चैन से जीने देता?
नारीवाद का झंडा उठाने वाली महिलाओं के साथ-साथ पुरुष भी आवाज़ उठाते।
लेकिन आज अंकल की ऐसी दर्दनाक मौत पर लोग आपस में गुपचुप बातें तो कर रहे हैं,
पर आंटी के सामने अंकल के लिए बोलने की किसी में ज़रा-सी भी हिम्मत नहीं है।
आख़िर क्यों?
क्योंकि वे एक पुरुष थे. बस इसलिए।सच यह है कि पुरुष का दर्द किसी को दिखाई ही कहाँ देता है?
किन्तु अब यह समझना होगा कि-“जब दर्द और तकलीफ़ स्त्री-पुरुष में भेद नहीं करती,तो यह समाज क्यों भेद करता है?”
आख़िर क्यों?
