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खुद को निहारना भूल गई वो..

कविता महिलाओं के अक्सर अनदेखे संघर्षों को उजागर करती है, जो हर रस्म, हर बंधन और त्यौहार निभाती हैं, फिर भी खुद की खुशियों और अपनी देखभाल के लिए समय नहीं निकाल पातीं। सुबह की भागदौड़, बच्चों को तैयार करना, टिफ़िन बनाना और घर के काम निपटाना—इन सब में वह अक्सर अपने आप को आइने में देखना भूल जाती हैं। पति, सास-ससुर और परिवार की जिम्मेदारियों को संभालते हुए हर छोटी-बड़ी बात पर ध्यान देती हैं, पर अपने लिए समय नहीं निकाल पातीं। बिंदी, पायल, झुमके और पल्लू संवारना—सब पीछे रह जाता है। बीमार होने पर भी उन्हें ताने और कई मुश्किल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। यह कविता महिलाओं की अद्भुत सहनशीलता, उनके कर्तव्यों के प्रति समर्पण और रोज़मर्रा के जीवन में किए जाने वाले भावनात्मक परिश्रम को दर्शाती है, जो अक्सर अनदेखा रह जाता है।

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स्त्री है त्रिशक्ति

स्त्री वास्तव में त्रिशक्ति का प्रतीक है—वह शारदा की ज्ञानमयी छवि है, शिवा की त्याग और साहस भरी ऊर्जा है और श्री की समृद्धि और करुणा से भरपूर है। उसका स्वरूप कभी पीपल की ठंडी छाँव-सा शीतल है तो कभी सावन की झड़ी-सा तरल और जीवनदायी। ठिठुरती सर्दियों में वह गुनगुनी धूप बन जाती है। सृष्टि की शुरुआत भी उसी से होती है और अंत भी उसी में समाया हुआ है।

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स्त्री का दर्द और समाज की सच्चाई

“स्त्री जब प्रेम में छल खाती है या विवाह में अपमान सहती है, तब उसकी संवेदना टूटी हुई कांच की तरह बिखर जाती है। ममता और त्याग की प्रतिमूर्ति होकर भी वह अधूरी कहानी लिखने पर विवश होती है। कभी अपने बच्चों की गलत परवरिश का दोष भी उसी पर आता है, तो कभी परिवार के विघटन का बोझ भी उसके कंधों पर डाल दिया जाता है। यदि नारी नफ़रतों के बीज बोना छोड़ दे और पुरुष अन्याय पर अपनी सहमति न दे, तभी प्रेम का प्रकाश फैलेगा और समाज में करुणा का पुनर्जन्म होगा। जिस दिन प्रेम हर हृदय में विस्तारित होगा, उस दिन नारी सचमुच लक्ष्मी स्वरूपा बनकर पूजी जाएगी।

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संवाद

यह रचना संवाद की इच्छा के माध्यम से जीवन के विभिन्न पहलुओं, मानवीय भावनाओं और सामाजिक विडंबनाओं को उजागर करती है। कवयित्री अपने मन की गहराइयों से उन क्षणों और पात्रों से बात करना चाहती है जो प्रकाश और अंधकार, प्रेम और वियोग, सम्मान और अपमान, मर्यादा और अन्याय, त्याग और पीड़ा के प्रतीक हैं। वह आकाश के अंधकार, स्वाति नक्षत्र की बूंद, सुगंधित पुष्प, शहीद की मां, परंपराओं से पीड़ित नारी, दहेज से आहत पिता, बिछड़े प्रेमी, व्यथित पुरुष, राम की मर्यादा, बुद्ध के धर्म ज्ञान और अश्रु की स्थिर बूंद तक—हर उस संवेदनशील अनुभव से जुड़ना चाहती हैं जो मनुष्य के भीतर गहराई से स्पंदित होता है। यह संवाद आत्मा की पुकार है, जो जानती है कि शब्द शायद परिभाषित न कर पाएं, लेकिन मौन में भी हृदय की पीड़ा सजीव हो उठती है।

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माँ जैसी नहीं हूं मैं…

यह कविता एक आत्मस्वीकृति है — एक बेटी की अपनी माँ के प्रति संवेदनाओं, निरीक्षणों और अनुभवों की गहराई से उपजी भावनाओं की अभिव्यक्ति। वह कहती है कि वह अपनी माँ की खामोशी पढ़ लिया करती थी, माँ के संघर्षों और त्याग की साक्षी रही है। माँ की आँखों में छिपे दर्द, जीवन की कठोर सच्चाइयों से संघर्ष, और अपनी इच्छाओं को निस्वार्थ भाव से दबा देने का दृश्य उसने बार-बार देखा।

वह माँ की हर वह चुप्पी पहचानती थी, जिसे दुनिया अनदेखा कर देती है। माँ के आँचल से आँसू पोछने से लेकर, चाँदनी रातों में अपने दुखों से बात करने तक की हर एक लम्हा, बेटी के मन में गहरे बैठ गया।

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जब स्त्री प्रेम करती है….

वो सीता की तरह अग्नि परीक्षा देती है, उर्मिला की तरह प्रतीक्षा करती है, राधा की तरह वियोग को स्वीकारती है, और मीरा की तरह प्रेम में ज़हर भी अमृत मान लेती है। स्त्री का प्रेम त्याग है, मौन की पुकार है, और एक सम्पूर्ण सृष्टि है — जिसे समझने के लिए साधक बनना पड़ता है।

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