उसकी आँखों क़ी ख़ामोशी पढ लिया करती थी मैं
कुछ इस तरह से हर रोज़ माँ से मिला करती थी मैं.
देखा था उसको सहते, तड़पते और फ़िर निपटते
आंचल क़ी कोर से ज़ब वो आंसू पोछती,,
उसके हालात से हालातों तक का सफ़र देखती थी मैं..
कई बार अंधियारे में सितारों से बात करती
चाँदनी रात में चाँद क़ो निहारा करती…
क्यूँ दर्द क़ो तुम अपने छुपा रखा ऐसा पूछा करती थी मैं.
उस दौर दुनियां के तरीकों क़ो सलीके से निभाया
अँधेरे क़ो चीर दीप तो उसने जलाया….
मगर कभी अपने सपनो क़ी बात नहीं क़ी
कभी दुखती रगों क़ो कोई भाँप नहीं दी…..
देखा हर पल सुलगते मैंने माँ क़ो…..
इसलिए आज़ ये कहती हूं मैं….
हूं तो माँ क़ी परछाई मगर माँ जैसी नहीं हूं मैं…..
हाँ माँ जैसी नहीं हूं मैं..

खुशी झा, प्रसिद्ध कवयित्री, मुंबई

क्या कहने सुंदर