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माँ जैसी नहीं हूं मैं…

यह कविता एक आत्मस्वीकृति है — एक बेटी की अपनी माँ के प्रति संवेदनाओं, निरीक्षणों और अनुभवों की गहराई से उपजी भावनाओं की अभिव्यक्ति। वह कहती है कि वह अपनी माँ की खामोशी पढ़ लिया करती थी, माँ के संघर्षों और त्याग की साक्षी रही है। माँ की आँखों में छिपे दर्द, जीवन की कठोर सच्चाइयों से संघर्ष, और अपनी इच्छाओं को निस्वार्थ भाव से दबा देने का दृश्य उसने बार-बार देखा।

वह माँ की हर वह चुप्पी पहचानती थी, जिसे दुनिया अनदेखा कर देती है। माँ के आँचल से आँसू पोछने से लेकर, चाँदनी रातों में अपने दुखों से बात करने तक की हर एक लम्हा, बेटी के मन में गहरे बैठ गया।

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सवाल मैं, जवाब में सन्नाटा

वो सबके लिए मोहब्बत बरसाता है, लेकिन मुझे किसी तमाशे की तरह अनदेखा कर देता है। उसकी रहमतें जब हर गली को भिगोती हैं, तब भी मैं सूखी ही रह जाती हूँ। जिसे कभी पलकों पर बिठाया था, वही मेरी आँखों में कांटे चुभो जाता है। मैं अपने सवालों में उलझी रहती हूँ, और वो जवाबों में सन्नाटा छोड़ जाता है। दूसरों की ज़िंदगी में वो सौ रंग भर देता है, मगर मेरे हिस्से हमेशा अंधेरा ही आता है। वो खुद भीड़ का हिस्सा बनकर चल पड़ता है, और मुझे तन्हाई में छोड़ जाता है। जब भी लौटता है शहर से, “गौरी”, तो बस उदासी का कोई नया किस्सा दे जाता है।

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