वो मोहब्बत भी करता है सबके लिए,
और मुझे किसी तमाशे सा छोड़ देता है.
भीग जाती हैं गलियाँ उसकी रहमतों से
मुझको हर बार वो सूखा छोड़ देता है.
जिसको पलकों पे रक्खा था मैंने कभी,
वो ही आंखों में कांटा छोड़ देता है.
मैं सवालों में डूबी सी रह जाती हूँ,
वो जवाबों में सन्नाटा छोड़ देता है.
जिसमें सौ रंग औरों को दे देता है,
बस मेरे ही हिस्से रंग काला छोड़ देता है.
खुद तो चल देता है भीड़ के साथ-साथ
और मुझको यूँ अकेला छोड़ देता है.
गौरी, वो जब भी लौटता है शहर से,
कुछ उदासी का किस्सा छोड़ देता है.

गरिमा भाटी, प्रसिद्ध लेखिका, फरीदाबाद
