क्या मैं सही हूँ?

कभी-कभी मन स्वयं से प्रश्न करता है—क्या मैं सही हूँ? मेरे विचार, मेरे निर्णय और मेरे कदमों की दिशा क्या वास्तव में उस सत्य की ओर जा रहे हैं, जिसे मेरी अंतरात्मा पहचानती है? सही और गलत का पैमाना हमेशा दुनिया की नजरों से नहीं तय होता। लोग कभी सराहना करेंगे, तो कभी आलोचना भी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मेरी आत्मा भीतर से शांत है, क्या मेरी अंतरात्मा मुझे स्वीकार करती है। यदि उत्तर “हाँ” है, तो वही मेरा सही होना है, क्योंकि अंततः सही और गलत का असली निर्णय बाहर से नहीं, भीतर से आता है।

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माँ जैसी नहीं हूं मैं…

यह कविता एक आत्मस्वीकृति है — एक बेटी की अपनी माँ के प्रति संवेदनाओं, निरीक्षणों और अनुभवों की गहराई से उपजी भावनाओं की अभिव्यक्ति। वह कहती है कि वह अपनी माँ की खामोशी पढ़ लिया करती थी, माँ के संघर्षों और त्याग की साक्षी रही है। माँ की आँखों में छिपे दर्द, जीवन की कठोर सच्चाइयों से संघर्ष, और अपनी इच्छाओं को निस्वार्थ भाव से दबा देने का दृश्य उसने बार-बार देखा।

वह माँ की हर वह चुप्पी पहचानती थी, जिसे दुनिया अनदेखा कर देती है। माँ के आँचल से आँसू पोछने से लेकर, चाँदनी रातों में अपने दुखों से बात करने तक की हर एक लम्हा, बेटी के मन में गहरे बैठ गया।

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मैं मुक्त होना चाहती हूँ

मैं मुक्त होना चाहती हूँ…

मैं मुक्त होना चाहती हूँ — यह सिर्फ एक ख्वाहिश नहीं, बल्कि मेरी आत्मा की पुकार है। उन अदृश्य ज़ंजीरों से आज़ाद होने की चाह, जो मेरे विचारों, रिश्तों और सपनों को जकड़े हुए हैं। यह एक सफर है खुद को पहचानने का, अपने भीतर के डर को हराने का, और उस जीवन को जीने का, जहाँ मैं बिना किसी शर्त के खुद को स्वीकार सकूँ।”

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