
मौसमी चंद्रा, पटना
“तुम बदल गई हो।”
उसने फोन कान से थोड़ा दूर किया, मुस्कुराई। इधर कुछ दिनों से यह लाइन वह कितने ही लोगों से कितनी बार सुन चुकी थी। मुस्कुराना तो बनता है!
“हो सकता है,” उसने सहज स्वर में कहा।
“पहले मैं नाराज़ होता था, तो तुम मनाने चली आती थी। अब लगता है, तुम्हें कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता।”
“फ़र्क आज भी पड़ता है… बस अब मैं हर फ़र्क के पीछे भागती नहीं।”
कहते हुए उसने सामने रखे कॉफी के कप पर उंगली रखी। “ठंडी तो नहीं हो गई!”
दूसरी ओर कुछ पल सन्नाटा रहा।
“देख रहा हूँ, अब तुम्हें रिश्तों की परवाह नहीं रहती!”
“परवाह नहीं रहती, यह मत बोलो। हाँ, उसे व्यक्त करने का मेरा तरीका ज़रा बदल गया है। जानते हो, एक उम्र तक मुझे लगता था कि हर रिश्ता बचा लेना चाहिए, हर नाराज़ आदमी को मना लेना चाहिए। फिर समझ आया कि जीवन कोई परीक्षा नहीं, जिसमें मिली हर प्रश्न-पत्रिका के सारे प्रश्न हल करना ज़रूरी हो!”
वह सुन रहा था।
“अब कोई मुझसे नाराज़ हो जाए, तो उसके हिस्से की नाराज़गी का पूरे दिल से सम्मान करती हूँ। होने देती हूँ उसे नाराज़। कोई बिना किसी वजह के दूर जाता है, तो उसकी उस दूरी में भी उसकी मदद करती हूँ। हर दूरी को अपनी हार नहीं मानती। न किसी छूटी हुई चीज़ का पछतावा लेकर बैठी रहती हूँ। जो मिलता है, जितना मिलता है, उसी को अपनी किस्मत मान लेती हूँ।”
“और तुम्हारे सपने?”
वह फिर हँसी।
“वे भी अब मेरे साथ बड़े हो गए हैं… मैच्योर।”
“मतलब?”
“मतलब अब मुझे सारा आसमान नहीं चाहिए। अपनी पसंदीदा चाय के साथ शांत-सी भोर, कुछ बेहद अपने लोग, अपने मन का लिखना-पढ़ना और ग़ज़ल के साथ सुकून भरी शाम की एक कप कॉफी… आजकल महत्वाकांक्षाएँ इतनी-सी रह गई हैं।”
“तुम्हें कभी नहीं लगता कि बहुत कुछ छूट गया?”
उसने बिना सोचे उत्तर दिया—
“लगता है… लेकिन अब उस एहसास में बेचैनी नहीं होती। कुछ भी परमानेंट नहीं है। न चीज़ें, न लोग!”
फोन के उस पार उसकी साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
फिर उसने धीरे से पूछा—
“और… प्रेम?”
इस बार वह दो मिनट रुकी।
“तुम्हें शायद हैरानी होगी, लेकिन मेरी नज़रों में प्रेम के मायने भी बदल गए हैं।”
“कैसे?”
“पहले लगता था, प्रेम का अंत साथ में होता है। हम साथ हैं, दिनभर में दस बार ‘आई लव यू’ बोलते हैं, तभी प्रेम साबित होगा। पर नहीं, यह गलत है। हम जिससे प्रेम करते हैं, यह बिल्कुल ज़रूरी नहीं कि वह भी उतना ही प्रेम वापस करे। फिर तो वह प्रेम नहीं, बंधन हो गया! मुझे प्रेम है, मैं करती हूँ… उसकी वह जाने। अगर उसे आगे बढ़ना होगा, तो बढ़ जाएगा!”
“अगर वह कभी लौटकर ही न आए?”
“तो उसके लिए मेरी सहानुभूति रहेगी! मेरे जैसी दूसरी कहाँ मिलेगी!”
“जाने का दर्द नहीं होगा?”
“होगा। लेकिन जो दर्द मेरा खुद का लिया हुआ है, उससे लड़ना भी मुझे ही होगा न!”
“तुम संत की तरह बातें करने लगी हो!”
हवा ने मेज़ पर रखी खुली डायरी के पन्ने पलट दिए।
उसने उन्हें बंद करते हुए कहा—
“हाँ, शायद! उम्र ने मुझे एक अजीब-सी राहत दी है। अब किसी से जलन नहीं होती। किसी की सफलता देखकर अपनी ज़िंदगी छोटी नहीं लगती। किसी के चले जाने से अपनी कीमत कम नहीं लगती। और किसी के आ जाने से मैं पूरी हो जाऊँगी… यह भ्रम भी नहीं रहा। इन सबका एहसास होना अगर संत बनना है, तो अच्छी बात हुई न!”
उधर से बहुत देर तक कोई आवाज़ नहीं आई।
फिर उसने धीमे से पूछा—
“तो अब तुम्हें चाहिए क्या?”
उसने बाहर देखा। डूबती धूप नीम की पत्तियों पर ठहरी हुई थी।
“बस इतना कि मेरा मन ऐसा ही बना रहे। जो मिले, उसके लिए कृतज्ञ रहूँ। जो न मिले, उसके लिए कटु न हो जाऊँ। जिसे प्रेम करूँ, उसे बाँधने की इच्छा न करूँ। और जिसे खो दूँ, उसके कारण खुद को ही न भूल जाऊँ!”
फोन कट गया। उसने दोबारा मिलाने की कोशिश नहीं की।
कॉफी अब पूरी तरह ठंडी हो चुकी थी। उसने उसे बिना शिकायत के एक ही साँस में पी लिया।
जीवन का हर घूँट हमारे तापमान से मैच करे ये जरूरी थोड़े न है !

हाय… हर बार दिल को छू लेती हो 👍