हर्ष के अंकुर

एक भारतीय वृद्ध दम्पति पार्क की बेंच पर बैठे हैं। उनके सामने बेटा-बहू हाथ जोड़कर क्षमा माँग रहे हैं, जबकि आसपास समाज के लोग और अधिकारी खड़े हैं। वातावरण भावुक, आशावान और पारिवारिक मेल-मिलाप का प्रतीक है।

पूनम सिंह वत्सला, जमशेदपुर

उपवन में बैठे एक बुजुर्ग कुछ सोच रहे थे। चुपचाप बैठे दूर से सबको टुकुर-टुकुर निहार रहे थे। वे बहुत ही परेशान लग रहे थे। उनका नाम शर्मा जी था।

वहीं कुछ दूर कुछ लोग अपने समूह में योग कर रहे थे। वे लोग दो-तीन दिनों से देख रहे थे कि शर्मा जी प्रतिदिन उपवन में आते, इस बेंच पर बैठते और काफी देर तक चुपचाप रहते। फिर लगभग एक घंटा बिताने के बाद अपने गंतव्य की ओर चले जाते।

एक दिन सबने विचार किया कि चलो उनसे पूछते हैं कि आखिर वे इतने चुप-चुप क्यों रहते हैं। क्या समस्या है? सब आपस में विचार करके शर्मा जी के पास पहुँचे और उनसे कहा, “हम आपको कई दिनों से देख रहे हैं कि आप हर रोज़ आते हैं, इस बेंच पर बैठते हैं और काफी देर तक चुप रहते हैं। क्या बात है? क्या परेशानी है? हमें बताइए, शायद हम सब मिलकर आपकी समस्या का समाधान कर पाएँ।”

शर्मा जी ने बहुत ही धीमी आवाज़ में कहा, “नहीं, मुझे कोई समस्या नहीं। मैं बस यूँ ही बैठा रहता हूँ।”

दूसरे व्यक्ति ने कहा, “आप शर्माइए मत। हम सभी के सामने अपनी बात रखिए। शायद हम आपकी मदद कर सकें।”

इतना कहने पर शर्मा जी ने बताया, “मुझे मेरे बेटे-बहू बहुत परेशान करते हैं। ठीक से खाना नहीं देते। मेरी पत्नी को नौकरानी की तरह रखते हैं। मेरी बहू अपनी सहेलियों को घर में बुलाकर पार्टी करती है। समुचित देखभाल के अभाव में मेरी पत्नी बीमार पड़ गई है। मैंने अच्छा-खासा काम करके यह घर बनाया था और आज सेवा-निवृत्ति के बाद भी मुझे ₹40,000 प्रतिमाह पेंशन मिलती है। बेटा-बहू पूरी धनराशि ले लेते हैं और मैं अपनी पत्नी को थोड़ी-सी खुशी भी नहीं दे पा रहा हूँ। इसलिए मैं बहुत परेशान रहता हूँ।”

यह पूछने पर कि फिर आप क्या चाहते हैं? क्या आप आश्रम में रहना चाहेंगे? शर्मा जी ने बड़ी विनम्रता से कहा, “मुझे कहीं एक झोपड़ी भी रहने के लिए मिल जाए, तो हम दोनों उसमें रह लेंगे। लेकिन अब अपने बेटे-बहू के साथ नहीं रहना चाहते।”

फिर सभी मिलकर उन्हें अपने क्षेत्र के विधायक के पास लेकर गए। विधायक ने वृद्धाश्रम में फोन किया और पूछा, “क्या आपके यहाँ कोई स्थान रिक्त है? दो बुजुर्ग हैं, उन्हें रखना है।”

वहाँ से मना होने पर विधायक ने अपने क्षेत्र के एसपी एवं डीएसपी को फोन करके बुलाया। सभी अधिकारी बुजुर्ग के घर गए। उन्होंने बेटे-बहू से बात की और उन्हें काफी फटकार लगाई, “जिन माँ-बाप ने तुम्हें इस लायक बनाया, तुम्हारा परिवार बसाया, आज तुम उन्हीं को परेशान कर रहे हो।”

सब गणमान्य नागरिकों को देखकर बेटे-बहू ने शर्मा जी से माफी माँगी। फिर शर्मा जी से पूछा गया, “क्या आप अपने बेटे-बहू के साथ रहना चाहते हैं?”

शर्मा जी द्वारा मना करने पर सभी अधिकारियों ने बेटे-बहू की ओर प्रश्नसूचक दृष्टि से देखा। उन्होंने पाया कि बेटे-बहू को अपनी त्रुटियों पर सच्चा पश्चाताप हो रहा है।

तभी उनमें से एक अधिकारी के पास फोन आया कि एक और बुजुर्ग दम्पति हैं, जिनकी कोई संतान नहीं है। वे भी वृद्धावस्था में बिना देखभाल के कष्ट में अपना जीवन गुजार रहे हैं।

यह सुनकर शर्मा जी ने कहा, “आप उन बुजुर्ग दम्पति को भी यहीं बुला लीजिए। हम चारों यहाँ सुख से अपना जीवन-निर्वाह कर लेंगे।”

तब तक बेटे-बहू की सारी निष्ठुरता आँसुओं में बदल गई थी।

बेटे-बहू ने एक स्वर में कहा, “हमें घर से बाहर मत निकालिए। हम दोनों अपने माता-पिता के साथ उन दोनों बुजुर्ग दम्पति की भी सेवा-सुश्रुषा करेंगे। अब आपको किसी भी तरह से शिकायत का अवसर नहीं देंगे।”

इतना सुनते ही शर्मा जी का भी जी भर आया।

उधर वे बुजुर्ग दम्पति भी वहीं आ गए। शर्मा जी ने उन्हें बड़े सम्मान से अपने पास बिठाया और सारी बात बताई। सारा परिदृश्य शुभकर हो गया था। सभी गणमान्य लोग बेटे-बहू को उचित दिशा-निर्देश देकर तथा शर्मा जी को ढाढ़स बँधाकर चले गए।

दोनों वृद्ध दम्पतियों की जीवन-गाड़ी पुनः सुख की पटरी पर सरपट दौड़ने लगी थी।

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