
सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज़, पुणे
रात के 12 बज चुके थे। राघव ऑफिस से लौटकर घर पहुँचा ही था। शहर की भागदौड़ भी थम चुकी थी, लेकिन राघव की बेचैनी अभी भी जाग रही थी। मोबाइल स्क्रीन पर रिद्धिमा का नाम चमक रहा था। उसने मुस्कुराते हुए कॉल रिसीव की।
“हैलो…”
उधर से वही धीमी, सुकून भरी आवाज़ आई।
“सो गए थे क्या?”
राघव हल्का-सा हँसा।
“जिसकी दुनिया हजारों किलोमीटर दूर हो, उसे नींद कहाँ आती है?”
कुछ पल दोनों तरफ खामोशी रही।
लॉन्ग डिस्टेंस रिश्तों की सबसे खूबसूरत बात यही होती है। वहाँ कई बार शब्द नहीं, सिर्फ एक-दूसरे की साँसें भी बातें करती हैं।
रिद्धिमा ने धीरे से पूछा, “आज बहुत चुप हो।”
“तुम्हारी याद ज़्यादा आ रही है।”
“हर दिन तो आती हूँ।”
“फोन पर आती हो… मेरे पास नहीं।”
रिद्धिमा मुस्कुरा दी।
“इतने बड़े हो गए हो, फिर भी बच्चों जैसी बातें करते हो।”
राघव ने गहरी साँस ली।
“तुम्हें पता है… आज ऑफिस से लौटते समय एक लड़की दिखी मुझे। सफेद सलवार-सूट में कुछ किताबें लेकर जा रही थी। उसे देखकर अचानक तुम्हारी याद आ गई।”
“मेरी?”
“हाँ… पता नहीं क्यों।”
फोन के उस पार कुछ क्षणों तक सिर्फ उसकी साँसें सुनाई देती रहीं।
फिर वह बोली, “राघव… एक बात बताऊँ?”
“हाँ।”
रिद्धिमा हमेशा कॉल या मैसेज पर ऐसे ही बोलती है—”एक बात पूछूँ?”, “एक बात बताऊँ…” या “एक बात बोलूँ…”
राघव ने कहा, ‘हाँ’, तो वह बोलने लगी-
“जब भी किसी कॉलेज के सामने से गुजरती हूँ न… तो मुझे कुछ याद आ जाता है।”
“क्या?”
उसने हल्की हँसी में अपना दर्द छिपाने की कोशिश की।
“क्योंकि मेरी पढ़ाई वहीं छूट गई थी।”
राघव चुप हो गया।
“बारहवीं के बाद घर की ज़िम्मेदारियाँ थीं। हालात ऐसे थे कि आगे पढ़ नहीं सकी। कभी-कभी लगता है… ज़िंदगी का एक हिस्सा वहीं रुक गया।”
राघव ने बहुत धीरे से कहा,
“लेकिन तुम सबसे ज़्यादा समझदार इंसान हो, जिसे मैं जानता हूँ।”
“समझदार इसलिए नहीं हूँ कि बहुत पढ़ी हूँ।”
“फिर?”
“क्योंकि ज़िंदगी ने पढ़ाया है।”
उसकी आवाज़ में शिकायत नहीं थी, सिर्फ स्वीकार था।
“मैंने हर छोटी चीज़ से सीखा। लोगों से, रिश्तों से, टूटने से, संभलने से… शायद इसलिए आज भी सीखना बंद नहीं किया।”
राघव मुस्कुराया।
“और इसलिए तुम छोटी-छोटी बातों में खुश हो जाती हो।”
“क्योंकि बड़ी खुशियाँ रोज़ नहीं मिलतीं।”
“आज क्या देखकर खुश हुई थीं?”
रिद्धिमा खिलखिला दी।
“आज बारिश हुई थी।”
“बस?”
“हाँ… मैं छत पर गई और पाँच मिनट बारिश को महसूस किया।”
“और?”
“गमले में दो पौधे लगाए, जिनमें एक इंसुलिन का है। फिर आजवाइन के पौधे लगाने के बारे में सोचती रही।”
राघव ने आँखें बंद कर लीं।
“यही तो है तुम्हारी सबसे बड़ी खूबसूरती।”
“क्या?”
“तुम ज़िंदगी को महसूस करती हो।”
दोनों फिर कुछ देर चुप रहे।
अचानक रिद्धिमा की आवाज़ बदली।
“राघव…”
“हम्म…”
“तुम सच-सच बताना…”
“पूछो।”
“तुम्हें कभी लगता है कि हम कभी-कभी बच्चों जैसी बातें करते हैं?”
राघव हँस पड़ा।
“नहीं… मुझे तो डर लगता है।”
“किस बात का?”
“जिस दिन तुम बोलना बंद कर दोगी, उस दिन समझ जाऊँगा कि कहीं न कहीं मैं तुम्हें खो चुका हूँ।”
फोन के उस पार अचानक सन्नाटा छा गया।
कुछ क्षण बाद रिद्धिमा की धीमी आवाज़ आई।
“जानते हो… एक स्त्री को सबसे ज़्यादा क्या चाहिए होता है?”
“क्या?”
“कोई उसे सचमुच सुने।”
राघव अब पूरी तरह गंभीर था।
रिद्धिमा बोलती रही—
“हमारे मन में भी हजारों बातें होती हैं। हम भी थकते हैं। हम भी डरते हैं। हमें भी अपनी तारीफ़ सुनना अच्छा लगता है।”
“हम्म…”
“लेकिन लोग अक्सर हमें समझने से ज़्यादा बदलने की कोशिश करते हैं।”
राघव ने धीरे से कहा,
“मैं कोशिश करता हूँ तुम्हें समझने की।”
“इसीलिए तो तुम मेरे इतने अपने हो।”
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
“एक स्त्री बहुत कुछ सह सकती है, राघव।”
“क्या?”
“गरीबी… ज़िम्मेदारियाँ… अकेलापन… इंतज़ार…”
“और क्या नहीं सह सकती?”
उसने बिना रुके कहा,
“अपमान।”
उस एक शब्द के बाद दोनों तरफ लंबी खामोशी थी।
राघव ने बहुत धीरे से कहा,
“मैं कभी तुम्हें चोट नहीं पहुँचाऊँगा।”
रिद्धिमा मुस्कुरा दी।
“शरीर की चोट नहीं डराती।”
“फिर?”
“शब्द…”
“क्यों?”
“क्योंकि शब्द आत्मा तक पहुँचते हैं।”
राघव की आँखें भर आईं।
“तुम्हें पता है… इस दूरी में सबसे ज़्यादा क्या मुश्किल लगता है?”
“क्या?”
“जब तुम्हारा मन उदास हो और मैं सिर्फ फोन पर तुम्हारी आवाज़ सुन सकूँ… तुम्हारा हाथ न पकड़ सकूँ।”
रिद्धिमा ने आँखें बंद कर लीं।
“लेकिन तुम्हारी आवाज़ मेरा हाथ पकड़ लेती है।”
राघव की साँसें तेज़ हो गईं।
“सच?”
“हाँ।”
“जब तुम कहते हो कि मैं ठीक हूँ… तब सचमुच लगने लगता है कि मैं ठीक हूँ।”
राघव मुस्कुराया।
“तुम्हें पता है, मैं रोज़ रात को सोने से पहले क्या सोचता हूँ?”
“क्या?”
“जिस दिन यह दूरी खत्म होगी… उस दिन मैं सबसे पहले तुम्हें बिना कुछ कहे बस देखता रहूँगा।”
“इतनी देर?”
“सालों की कमी पूरी करनी होगी।”
रिद्धिमा हँस पड़ी।
“और मैं?”
“तुम क्या करोगी?”
“मैं तुम्हारे लिए चाय बनाऊँगी।”
राघव ने शरारत से पूछा,
“बस?”
“नहीं…”
“फिर?”
“जब तुम पहली बार मेरे सामने बैठोगे, तब मैं तुम्हें बहुत देर तक देखूँगी… और मन ही मन भगवान का धन्यवाद करूँगी कि जिसने मेरी खामोशियों को भी सुन लिया, उसे मेरी ज़िंदगी में भेज दिया।”
राघव की आँखों से एक आँसू निकलकर तकिए पर गिर पड़ा।
उसने धीरे से कहा,
“आई लव यू, रिद्धिमा।”
उधर कुछ पल कोई जवाब नहीं आया।
फिर बहुत धीमी, काँपती हुई आवाज़ सुनाई दी।
“मैं भी तुमसे बहुत प्रेम करती हूँ, राघव।”
“कितना?”
“इतना… कि यह हजारों किलोमीटर की दूरी भी मेरे प्रेम को कम नहीं कर सकी।”
घड़ी में रात के 1.30 बज चुके थे।
कॉल अब भी जारी थी।
दो शहर अब भी दूर थे, लेकिन दो दिलों के बीच की दूरी…
कब की समाप्त हो चुकी थी।

बहुत प्यारी स्टोरी! कितना सुन्दर भाव तथा कला पक्ष! पढ़कर मन आनंदित हो गया! साधुवाद!