एक भारतीय वृद्ध दम्पति पार्क की बेंच पर बैठे हैं। उनके सामने बेटा-बहू हाथ जोड़कर क्षमा माँग रहे हैं, जबकि आसपास समाज के लोग और अधिकारी खड़े हैं। वातावरण भावुक, आशावान और पारिवारिक मेल-मिलाप का प्रतीक है।

हर्ष के अंकुर

‘फिर हर्ष के अंकुर फूटने लगे’ एक मार्मिक सामाजिक कहानी है, जो बताती है कि माता-पिता का सम्मान केवल नैतिक कर्तव्य नहीं, बल्कि परिवार की सबसे बड़ी पूँजी है। उपेक्षा, अकेलेपन और पीड़ा से जूझ रहे एक बुजुर्ग दम्पति की कहानी तब नया मोड़ लेती है, जब समाज, प्रशासन और परिवार मिलकर रिश्तों को टूटने से बचाने का प्रयास करते हैं। पश्चाताप, क्षमा और सेवा के भाव से यह कहानी मानवीय संवेदनाओं को गहराई से स्पर्श करती है।

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