
गरिमा भाटी, प्रसिद्ध लेखिका, फरीदाबाद
मैं मुक्त होना चाहती हूँ
यह सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि मेरी आत्मा की पुकार है।
एक छटपटाहट है, उस सबसे निकलने की,
जो मुझे जकड़े हुए है, जिसने मेरी सोच को घेर रखा है,
और मेरी उड़ान को रोक रखा है।
मैं मुक्त होना चाहती हूँ उन विचारों से,
जो मेरे मन को बार-बार गिराते हैं,
मुझमें संदेह भर देते हैं,
और मेरी अस्मिता को कमज़ोर कर देते हैं।
मैं मुक्त होना चाहती हूँ उन रिश्तों से,
जो दिखावे के पंखों में छुपे होते हैं,
जो मेरे अस्तित्व को नकार देते हैं,
और मेरी भावनाओं को दबा देते हैं।
मैं मुक्त होना चाहती हूँ उन ज़ंजीरों से,
जो मेरे हृदय को कठोरता से कसते हैं,
और मेरे सपनों को अधूरा छोड़ देते हैं।
मुक्ति का मतलब है खुद को पहचानना,
खुद से जुड़ना, और अपने भीतर की आवाज़ सुनना।
मुक्ति का मतलब है उस बोझ से आज़ादी,
जो जीवन के संघर्षों और समाज की अपेक्षाओं ने दिया है।
मैं मुक्त होना चाहती हूँ
अपने भय से, अपने अतीत से,
और उन तमाम बंदिशों से जो मुझे अंदर से तोड़ रही हैं।
यह मुक्ति मेरी आत्मा की जंग है,
एक सफर है अपने भीतर के उजाले की ओर,
जहाँ मैं बिना किसी डर के, बिना किसी शर्त के,
अपने आप को पूरी तरह से स्वीकार सकूँ।
मुक्ति केवल शारीरिक नहीं,
यह मन और आत्मा की आज़ादी भी है।
और मैं उस आज़ादी को पाने के लिए,
हर दिन, हर पल संघर्ष करती रहूँगी।
क्योंकि मैं जानती हूँ
जब मैं मुक्त हो जाऊँगी,
तब मैं सचमुच जिऊँगी,
और वही जीवन होगा,
जिसका सपना मैं देखती रही हूँ।
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