मुझमें कुछ भी नहीं है जिंदा..

शून्यता और अकेलेपन को दर्शाता एक व्यक्ति, जो विचारों के सागर में खोया हुआ है “जब इंसान खुद से ही दूर हो जाए शून्यकाल की अनुभूति”

-आशा सोन, प्रसिद्ध कवयित्री, पिथौरागढ़, उत्तराखंड

मुझमें कुछ भी नहीं है ज़िंदा,
अभी मुझमें कुछ भी नहीं है ज़िंदा,
मैं बस अब खाली और शून्य हूँ।

मैं क्या कहती हूँ कुछ भी तो नहीं,
पर कहती हूँ, बस कहती ही रहती हूँ।

बावजूद इसके, गुणा-भाग चलता है
अनवरत।
खुली दिशाओं को सहेजे,
कोई ज़हरीली-सी चीज़ मन को
अपने ज़हर से सींचती रहती है।

क्या है ऐसा, जो हर शख़्स कहना चाहता है,
पर बाहरी दबाव के चलते
अंदर की घुटन को
तरजीह दिए बैठा है?
फिर वही बात, फिर वही शून्यकाल।

तुम्हारे पते पर मुझे कोई आदमी नहीं मिला,
और अपने पते का मैं आदमी नहीं हूँ।

घरों पर नाम, ओहदे और इंसानों की संख्या
कहाँ बता पाती है
कि वह सचमुच एक घर है।

और इन्हीं संख्याओं में कोई एक आदमी
निकल पड़ता है बार-बार
अपने पते का होने को।

विचारों के ज्वार-भाटा पर बैठा
सोचता, तोलता, मरोड़ता, निचोड़ता,
खुद पर थोपता
शून्यता के छिछले सागर में
खुद को भिगोता,
भूल जाता है पते का आदमी होना।

मैं क्या कहती हूँ कुछ भी तो नहीं कहती,
पर कहती हूँ, बस कहती ही रहती हूँ।

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