
जोशना बैनर्जी आडवानी , सुप्रसिद्ध लेखिका, आगरा
तब,
जब दस्तानों के भीतर भी पूस कंपाता रहा
और कंठ में काँटे बड़े हो रहे थे,
तब,
जब कंदील माँगने पर मिला हो एक माचिस
और निकटता माँगने पर मिली हो पेड़ की खाल,
ठीक तभी
उतावलेपन में किए गए सभी कार्यों के मध्य
छूट गई एक कॉल।
ऐसे नहीं छूटी
जैसे छूट जाती है ट्रेन,
बल्कि ऐसी छूटी
जैसे छूट जाता है बाल्यकाल।
तब,
जब मालिक ने फोन मिलाया
एक और काम बताने के लिए,
हो रहा था शाम से टेलबोन में दर्द।
इस दफे
दर्द पहले पहुँचा मुझ तक,
फोन फिर रह गया पीछे कहीं।
जब देह की पीड़ा
मालिक के हुक्म से भी बड़ा आकार ले ले,
तब आप बन जाते हैं
इस पृथ्वी के सबसे आलसी थलचर।
मालिक की छूटी कॉल
छूटकर भी कहीं नहीं छिटकती,
वेतनवृद्धि के रास्ते में
नंगनाच करती है।
दस साल बाद
मेरे शहर से होकर गुजरती ट्रेन से
गुजर रहा था एक दोस्त,
जितनी देर ट्रेन रुकती,
उतने समय में
मिलने की अभिलाषा लिए
लगाया होगा फोन।
वर्षा के कारण
बिल्लियों को करना था अंदर,
तार से खींचने थे सारे कपड़े।
फोन की ध्वनि से पहले
वर्षाजल की ध्वनि पहुँची कानों में
और मैं
एक खराब दोस्त साबित हुई।
जिस प्रकार
आ जाता है गर्भ में शिशु,
डिप्रेशन
उस तरह से मस्तिष्क में नहीं आता।
छूटी कॉल
छूटते समय
एक पत्ते की तरह गिरती है
समय के अंक में
शांत, हल्की,
गिरते ही
बम फटने जितना
बड़ा धमाका करती है।
जिसकी माँ को खून देने का वायदा था,
कह दिया था मैंने उससे
कि एक फोन पर पहुँच जाऊँगी उसके पास।
क्या हुआ था उस दिन—
स्मृति में नहीं।
गहरी नींद सो रही थी,
या गिन रही थी रुपये,
सुन रही थी राग मारवा,
या सूँघ रही थी कंदपुष्प—
संभव है
उस समय किसी के तानों से
त्रस्त रही होऊँ।
छूट गई
एक और कॉल।
कुछ भी स्मृति में नहीं,
आवश्यक नहीं
कि मुझे मनुष्य ही समझा जाए।
चाहे तो
चरित्रहीन, दुष्टा, चेष्टाहीन समझा जाए,
लुंठन के लिए लज्जा,
बचतों के लिए एक आना समझा जाए,
मोची की सुई,
किन्नर की ताली,
चाहे सबसे ठोस पत्थर
समझा जाए।
कुछ भी समझा जाए—
मुझे छूटी हुई कॉल की
दरिद्र पापिन ही समझ लिया जाए,
परवाह नहीं।
छूटी हुई कॉल्स के संकट से बिंधा समय
किसी शोक सभा की शांति जितना ही अर्द्ध है—
चंद्र ढका है,
सूर्य नारंगी,
बूढ़े, शिथिल पेड़,
गरीब देश जैसा एक घर।
खाल के नीचे
नीला खून,
निष्कवच
एक आत्मा।
निस्संदेह निष्कवच,
निस्संदेह संकट।
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– सुरेश परिहार