
विजया डालमिया, प्रसिद्ध लेखिका, हैदराबाद
मस्ती का खजाना… नानी के घर जाना…
गर्मी की छुट्टियां आएँ, नानी के घर की याद दिलाएँ। गर्मी की छुट्टी और नानी का घर दोनों में बड़ा गहरा नाता है। दोनों एक-दूजे के बिना अधूरे हैं।
बचपन से एक विज्ञापन हमें बहुत लुभाता था”लाइफबॉय है जहाँ, तंदुरुस्ती है वहाँ” और तंदुरुस्ती पाने के लिए हम मचल जाते थे नानी के घर जाने को, क्योंकि “लाइफबॉय” और तंदुरुस्ती की लाइफ—दोनों वहीं थीं।
नाच-नाच कर गुनगुनाते भी रहते थे—
“नानी के घर जाएंगे,
दही-रोटी खाएंगे,
मोटे होकर आएंगे।”
ऐसी कितनी ही खुशबू भरी बातें हैं जो नानी के घर से जुड़ी हैं। सारी यादें एक के साथ एक सिरा पकड़े हुए चली आती हैं मेरे जीवन में…
कोयले के इंजन से लेकर बुलेट ट्रेन तक का सफर करने वालों की यादों के पिटारे में सबसे पहले छुक-छुक करती ट्रेन और हवा में उड़ते गर्म कोयले का एहसास है, जो हाथों की मेहंदी को और गहरा कर देता था। हम देख-देखकर खुश होते थे कि मेहंदी कितनी गहरी रची है। साथ ही चेहरा भी बदरंग हो जाता था, पर मस्ती और उमंग में कुछ याद कहाँ रहता था।
गर्मी ज्यादा लगने पर ट्रेन की खिड़की में टॉवल लगाकर उसे गीला करना और ठंडक का एहसास पाना बहुत मायने रखता था। स्टेशन से बाहर निकलते ही हमारी शान की सवारी तांगा नजर आ जाता था। सच! वह तांगे का सफर भुलाए नहीं भूलता। घोड़े की टाप की आवाज की नकल करते-करते नानी के घर पहुँच जाते थे। बदरंग चेहरे भी खिल उठते थे जब सब से गले मिलते थे।
वह भी क्या दिन थे, जब किसी की बहन-बेटी आने पर वह पूरे मोहल्ले की खुशी बन जाती थी। उनके तांगे या रिक्शे के पीछे-पीछे भागते बच्चों का हुजूम शोर मचाता चला आता था।
उन दिनों कभी गर्मी का एहसास हुआ ही नहीं। सोचती हूँ—वह नानी-मौसी की ममता की शीतल छांव थी या बचपने की बेफिक्री की ठंडक, जो तपती दोपहरी में भी हमें खेलने के लिए खींच ले जाती थी।
नीम के पेड़ के नीचे खड़ी तपती टूटी बस में इकट्ठे होकर खेलना, निंबोली चुन-चुन कर खाना सब कुछ कितना प्यारा था।
रातों में मच्छर भगाने के लिए मच्छरदानी लगाना। तब कहाँ थी “गुड नाइट”, पर हाँ उन रातों को सही अर्थों में “गुड नाइट” कहा जा सकता है।
एक-दूसरे की चादर और तकिया खींच कर अपना हक जताना बड़ा मजा देता था। कुल्फी वाले की घंटी की टन-टन-टन सुनकर सारे बच्चों का एक साथ चिल्लाना “चलो कुल्फी खाने!”और उस कुल्फी का बेसब्री से इंतजार करना सब कुछ आज भी ताजा है।
सिगड़ी में बनते गरमा-गरम पराठे, जिनसे पूरा घर घी की खुशबू से महक उठता था। दौड़ते हुए आना, खाना और फिर भाग जाना।
रात में चूल्हे पर रखी काली हांड़ी का दूध और उसकी कुरचन आज भी याद आते ही मुँह में पानी आ जाता है। तब न गैस थी, न पैकेट वाला दूध—सब कुछ शुद्ध था, चाहे खाना-पीना हो या मस्ती।
बिना किसी शादी के भी, जब सब इकट्ठा होते थे, तो घर शादी जैसा लगने लगता था। सारे लोग मिल-जुल कर काम करते थे और हम बच्चे अपनी मस्तियों में गुम रहते थे।
तब कौन जानता था एसी? खस के पर्दे ही सुगंध के साथ शीतलता देते थे। बाथरूम में शावर कहाँ थे नल के पानी को रोककर ही बाथटब का मजा लिया जाता था। साथ नहाने में भी कोई शर्म नहीं थी मन बहुत भोला था।
सभी बच्चों के लिए एक जैसे कपड़े के थान लाकर कपड़े सिलवाए जाते थे, जिन्हें पहनकर हम बैंड पार्टी जैसे लगते थे। तब कहाँ समझ पाए थे कि आगे चलकर यही थीम फैशन बन जाएगी।
वह दोपहर अब कहाँ, जब घर के बड़े आराम करते थे और हम मस्ती के नए रास्ते निकालते थे। रात में कहानी सुनने की जिद सबको एक जगह खींच लाती थी। धर्म, परिवार और जीवन की कहानियाँ सब कुछ बहुत अच्छा लगता था।
इतने भोले थे कि भगवान के नाम पर डरते भी थे और पूजा भी करते थे। वही संस्कार आज हमें हर डर से दूर रखते हैं।
गर्मियों की लंबी छुट्टियों में नानी का घर हमेशा यादों में समाया रहता है. तब भी और अब भी, जब मैं खुद नानी बन चुकी हूँ। बच्चों को खेलते देख, मैं फिर पहुँच जाती हूँ अपने नानी के घर…
एक सौंधी-सी खुशबू, नानी के घर की गली शुरू होते ही आने लगती है।
खुलते ही घर का दरवाजा
आमने-सामने हो जाते हैं मैं और वे बीते पल।
आज वही आँगन, वही दीवारें मुझे मुँह चिढ़ाती हैं।
नानी का चूल्हा मैं पहचान नहीं पाती।
वह चूल्हा, जो सेंकता था अनगिनत रोटियाँ,
जहाँ बनते थे लजीज पकवान।
कहाँ खो गई वह सब रौनकें
साथ मिल-बैठकर खाना,
लड़ना-झगड़ना, रूठना-मनाना,
चोरी-छुपे घूमने जाना, देर से आना और डाँट खाना…
काश! लौट आता फिर वो बीता जमाना…
ये रचनाएं भी पढ़ें
छूटी हुई फोन कॉल्स के संकट ….
मुझमें कुछ भी नहीं है जिंदा….
ये कैसा सवाल
डिब्बे वाले

2 thoughts on “वो जो छुट्टियां थीं”