
प्रतिभा दुबे, प्रसिद्ध कवयित्री, ग्वालियर
मेरे मन के तार तुम्हारे,
तुमसे ही तो जीवन का
सारा दूर है तनाव हमारे।।
जब भी अनुभव कुछ पाऊँ,
अपने शब्दों में उनको पिरोकर,
मैं काव्य-सृजन कर लेती हूँ,
हर लम्हे को अक्सर लिखती हूँ।।
लिख देती हूँ तमाम मन की उलझनें,
जो सुलझ जातीं कागज़ पर कलम से,
अपने संवादों के साथ मैं कविता-रूप में,
नित अपने शब्दों को प्रेम से संजोती हूँ।।
प्रीत-प्रेम सी प्यारी, मुझको कविता,
जीवन-आनंद तुम मुझको देती हो,
हर भाव संग लेखन में रंग भरूँ जब,
एक अनुभूति अलग ही तुम देती हो।।
बनकर उभर आती हो कभी जीवनी,
शब्दों के समूह से कहीं कहानी होती हो,
मेरे मन के बगीचे में स्थापित दिव्य कमल,
कविता, तुम ही मेरी प्रिय सखी-सी हो।।
प्रिय “कविता” साहित्य-काव्य की बिटिया।
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