एक पथिक

समुद्र किनारे अकेला पथिक दूर क्षितिज की ओर देखता हुआ समुद्र किनारे अकेला पथिक

विजयलक्ष्मी सिंह, प्रसिद्ध लेखिका

शांत जलधि, गांभीर्य लिए, अद्भुत तरंगें इसकी।
देखकर स्तब्ध हुई मैं, ठहरी हुई तरंगें जिसकी।

तुम भी चुप और हम भी चुप, कैसे कहें दास्ताँ अपनी।
कुछ तरंगें गर उठें, तो बात कर लूँ कुछ उनसे अपनी।

मन व्यथित अंदर से मेरा, कुछ सुकून की तलाश में।
तुम तो हो अथाह सागर, थाह कैसे पा सकूँ?

आज हलचल है जो मन में, व्यक्त कैसे कर सकूँ।
वीरान मन तो है मगर, मगरूर मन न बन सका।

ऐ पथिक, तुम दूर जाकर निगाहों से मेरे ओझल हो गए।
हर पल तसव्वुर में मेरे आए, और आते ही चले गए।

मन की बातें तुमसे कर लूँ, कुछ कदम जो चल पाऊँ तो।
बेहतर यही होगा कि तेरी लहरों में ही समा जाऊँ मैं।

करके इंतज़ार थक चुकी मैं, सब्र न हासिल हुआ।
हम अकेले, मन अकेला, मुझसे न कुछ कह सका।

तू बता कि क्या करूँ मैं, कुछ समझ आता नहीं।
न हारी हूँ, न चाहती हारना मैं ऐ खुदा, है तेरी क्या रज़ा?

ख़ामोशी के पते
जहाँ कुचली जाती है, वहीं उगती है स्त्री
माँ की तपस्या, बेटी की उड़ान
कटहल! कटहल! कटहल!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *