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स्त्री : परम्परा और प्रगति की देहरी पर

मुंबई में आयोजित महिला सशक्तीकरण पर साहित्यिक कार्यक्रम का दृश्य “स्त्री विमर्श के स्वर — परम्परा और प्रगति के बीच संवाद”

साहित्यिक आयोजन में गूंजे स्त्री विमर्श के स्वर

मुंबई से प्रसिद्ध लेखिका डॉ. मधुबाला शुक्ला की रिपोर्ट

मुंबई। मार्च माह, जिसे विश्वभर में स्त्री अस्मिता और सशक्तीकरण के उत्सव के रूप में जाना जाता है, के अवसर पर सांस्कृतिक संस्था ‘बतरस : एक अनौपचारिक उपक्रम’ द्वारा ‘स्त्री : परम्परा व प्रगति की देहरी पर’ विषयक एक समृद्ध साहित्यिक एवं वैचारिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर स्त्री जीवन के विविध आयामों, संघर्षों और उपलब्धियों पर गंभीर चर्चा हुई।

कार्यक्रम की मुख्य वक्ता विभा रानी ने अपने विचारों में स्त्री-पुरुष असमानता के अनेक पहलुओं को उजागर किया। उन्होंने बताया कि खेतिहर मजदूरी के उदाहरणों से लेकर आज के निजी क्षेत्रों तक, समान कार्य के बावजूद स्त्रियों को कम वेतन मिलना एक गंभीर समस्या है। उन्होंने व्यंग्यात्मक शैली में कहा कि यदि पुरुष स्वयं को श्रेष्ठ मानते हैं, तो वे अकेले ही सृष्टि चलाकर दिखाएं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं और वास्तविक समानता स्थापित होने पर महिला दिवस मनाने की आवश्यकता ही समाप्त हो जाएगी। उन्होंने सामाजिक विडंबनाओं पर भी प्रकाश डाला चाहे वह शहीदों की पत्नियों की उपेक्षा हो, तलाकशुदा स्त्रियों के प्रति संकीर्ण दृष्टिकोण, या महानगरों में अकेली महिलाओं को किराए का घर लेने में आने वाली कठिनाइयाँ। विभा रानी ने यह भी कहा कि स्त्री को केवल कोमल ही नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार सशक्त और दृढ़ भी बनना होगा।

‘कविता में स्त्री’ शीर्षक के अंतर्गत आयोजित प्रस्तुतियों में ग़ज़लकार राकेश शर्मा ने कैफ़ी आज़मी की नज़्म का पाठ किया, वहीं जवाहरलाल ‘निर्झर’ ने लोकगीत से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। रमन मिश्र ने ‘अली अम्मा’, ‘दो बहनें’ और ‘औरत’ जैसी कविताएँ प्रस्तुत कीं। रासबिहारी पांडेय के गीतों ने भावनात्मक वातावरण निर्मित किया, जबकि अनिल गौड़, अंबिका झा और कल्पेश यादव की प्रस्तुतियों को भी सराहना मिली।

प्राध्यापक बृजेश सिंह ने चैता गीतों से तालियाँ बटोरीं, वहीं प्रज्ञा मिश्र ने ‘कामायनी’ के ‘श्रद्धा सर्ग’ का सस्वर पाठ किया। अभिनेता सोनू पाहुजा ने मन्नू भंडारी की कहानी ‘अकेली’ का प्रभावी मंचन किया और आशी मालवीय ने ‘सक़ू बाई’ का अंश प्रस्तुत किया। प्रमोद सचान ने ‘अंधा युग’ से गांधारी के विलाप को जीवंत किया।

कार्यक्रम का संचालन प्रतिमा सिन्हा ने प्रभावशाली ढंग से किया। इस अवसर पर प्रो. सत्यदेव त्रिपाठी, विजय पंडित, विजय कुमार, शाइस्ता खान, कमर हाजीपुरी, डॉ. आर.एस. रावत और बबीता सहित अनेक साहित्यप्रेमियों की उपस्थिति रही।

कविता, नाटक, गीत और विचारों के माध्यम से सजी यह संध्या राष्ट्रगान के साथ संपन्न हुई।

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