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चिड़िया-सी उड़ान

मैं फिर से बच्ची बनना चाहती हूँ — बिना डर, बिना संकोच। खुलकर हँसना-रोना, बारिश में भीगना और सिर्फ माँ-पापा के दुलार में खो जाना। दुनिया की सोच से परे, कुछ पल के लिए सिर्फ अपने होने को जीना चाहती हूँ।”

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आज़ादी स्त्री की…

उस स्त्री की आत्मा कहती है—”मैंने हमेशा यही सोचा था कि मैं आज़ाद हूँ। पर हर पड़ाव पर बंधनों ने मुझे जकड़ लिया।
कभी भाई ने मेरे वस्त्रों पर नियंत्रण किया, कभी सास ने मेरी इच्छाओं को ढकने के लिए पल्ले और क्लिप्स थमा दिए। जीवन भर मैंने परंपराओं, रिश्तों और सामाजिक मान्यताओं के नाम पर अपने अस्तित्व को ढका। और फिर मृत्यु आई। सफेद चादर में लिपटी मैं, अपनी ही देह को राख होते देखती रही।

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मैं मुक्त होना चाहती हूँ

मैं मुक्त होना चाहती हूँ…

मैं मुक्त होना चाहती हूँ — यह सिर्फ एक ख्वाहिश नहीं, बल्कि मेरी आत्मा की पुकार है। उन अदृश्य ज़ंजीरों से आज़ाद होने की चाह, जो मेरे विचारों, रिश्तों और सपनों को जकड़े हुए हैं। यह एक सफर है खुद को पहचानने का, अपने भीतर के डर को हराने का, और उस जीवन को जीने का, जहाँ मैं बिना किसी शर्त के खुद को स्वीकार सकूँ।”

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