बच्ची बनना चाहती हूँ
एक बार फिर,
खुलकर हँसना, खुलकर रोना चाहती हूँ।
बिना किसी बात पर मचलना चाहती हूँ,
बारिश की बूँदों में फिर भीगना चाहती हूँ।
किंतु-परंतु, तेरा-मेरा, इसका-उसका,
इन सबसे परे,
खुले आकाश में चिड़िया-सी
निर्भीक चहकना चाहती हूँ।
“बहादुर हो तुम, समझदार हो तुम” —
अब ये सुनना नहीं चाहती हूँ।
“यह क्या सोचेगा, वह क्या सोचेगा” —
अब यह सोचना भी नहीं चाहती हूँ।
कुछ पल के लिए
खुद को भी न पहचानना चाहती हूँ,
सिर्फ पापा का प्यार
और माँ का दुलार —
सिवा इसके कुछ और नहीं चाहती मैं।

मधु चौधरी, लेखिका, विल्सन कॉलेज मुंबई

यह जमाना ना आकाश में तुमको उड़ने देगा, ना चैन के कुछ छोटे-छोटे पल जो तुम चाहती वह नसीब होंगे। तुमको हर पल चौकन्ना रहना है !
उम्र के आधे पड़ाव पर आकर यही अभिलाषा होती है। बचपन जैसा जीवन फिर कभी नहीं मिलता। बहुत ही सुन्दर कविता है।
जैसे जैसे उम्र गुजरती जा रही है दिल बच्चा बनने की ज़िद कर रहा है। काश ऐसा हो सकता। अति सुन्दर