अनु बारिश में बालकनी से खेलती बच्चों और इंद्रधनुष को देखती

अनु और बारिश की रात

बारिश और बचपन की यादों में खोई अनु की कहानी। इंद्रधनुष, कागज़ के जहाज और नहर किनारे की खेल-खिलवाड़ भरी यादें जीवंत कर देती हैं बचपन की मासूमियत।

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मैं तुम्हें सोचता रहता हूँ…

यह कहानी प्रतीक्षा के उस नाज़ुक क्षण की दास्तान है, जहाँ प्रेम शब्दों से पहले मौन में पलता है। किताबों, कॉफी-हाउस और बारिश में भीगे स्वीकार के बीच, एक स्त्री वर्षों तक एक वाक्य के सहारे जीती रहती है—“I am well thinking of you always.” यह केवल स्वीकार नहीं, बल्कि संकोच, भय और आत्म-संयम को पार कर प्रेम को आवाज़ देने की कथा है।

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वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी

बचपन की यादें हमेशा खास रहती हैं। रविवार की सुबह, बारिश में कागज़ की कश्ती तैराना, दोस्तों के घर जाकर टीवी देखने की खुशी ये छोटे-छोटे पल हमारी दुनिया को पूरी तरह जीवंत बना देते थे। अब काम, ऑफिस और जिम्मेदारियों के बीच वही मासूमियत खो गई है, पर अंदर वही छोटा बच्चा अभी भी जिंदा है, बारिश में कागज़ की कश्ती बहा रहा है, और हर याद उसे मुस्कुराकर बुला रही है।

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कागज़ की कश्ती

कविता बचपन की उन मीठी यादों को जीवंत करती है जब बारिश में “कागज़ की कश्ती” सपनों का प्रतीक बन जाती थी। न चिंता थी, न भय—बस मासूमियत और आनंद था। अब वक्त बदल गया है; बारिश, दोस्त और वो बचपन सब पीछे छूट गए हैं। “कागज़ की कश्ती” आज सिर्फ उन सुनहरे दिनों की प्यारी याद बनकर रह गई है।

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बरसात में…

बरसात को जीवन, प्रकृति और मानवीय अनुभवों का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया गया है। बारिश की बूंदें पत्तों और फूलों पर मोती की तरह टपकती हैं, बिजली के तारों पर झिलमिलाती हैं और धरती में अमृत जैसी बूंदों के रूप में समा जाती हैं। वहीं, जर्जर मकान ढहते हैं और लोग अपने घरों और यादों को बचाने के लिए प्रयास करते हैं। शहर और गाँव की सड़कों पर बच्चे बारिश में खेलते हैं, नदियाँ अपने भीषण बहाव में सब कुछ बहा लेती हैं, और जानवर तथा पक्षी अपनी परिस्थितियों से जूझते हैं। इसके बीच, बरसात जीवन में रिश्तों, साहस और मानवीय संवेदनाओं को पुनर्जीवित करती है। कविता यह दर्शाती है कि बरसात का सौंदर्य और जीवन में उसकी भूमिका पहले जैसी रह गई है, लेकिन अब वह पहले जैसी रूमानी नहीं लगती।

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बस अब और नहीं 

सान्वी ने सुबह की सारी व्यस्तताओं से निवृत्त होकर बालकनी में बैठकर बारिश की बूंदों को निहारना शुरू किया। उसी समय उसके भीतर लंबे समय से चल रहे संघर्ष और आंतरिक तूफ़ान ने नया रूप ले लिया। अतीत के घाव, निराशा और खुद से होने वाली आत्मग्लानि ने उसे झकझोर दिया। और तभी उसने ठान लिया. बस, अब और नहीं!”उसने अपने अनवरत युद्ध को विराम देने का साहस जुटाया, और अपने अंतर्मन पर पूर्ण नियंत्रण पाकर आत्मा की जीत का अनुभव किया।

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प्रकृति…

प्रकृति हर पल हमें कुछ न कुछ सिखाती रहती है। ठंडी हवाएँ हमें कहती हैं कि चलते रहो, कभी मत रुको और अपना लक्ष्य पाकर ही ठहरो। चहचहाते पक्षी यह संदेश देते हैं कि परिस्थितियाँ जैसी भी हों, मुस्कुराते रहो और जीवन का आनंद लो। घड़ी की टिक-टिक हमें याद दिलाती है कि समय की कद्र करो, क्योंकि एक बार बीता हुआ वक्त कभी लौटकर नहीं आता। रिमझिम बारिश की बूँदें सब्र करने का पाठ पढ़ाती हैं और बताती हैं कि धैर्य का फल सदैव मीठा होता है। वहीं, जगमगाते जुगनू यह सीख देते हैं कि अंधेरों में भी रोशनी तलाशनी चाहिए। सच तो यह है कि प्रकृति अनजाने में ही हमें जीवन के गहरे सत्य सिखा देती है, लेकिन अक्सर हम इंसान इतने नासमझ होते हैं कि उन्हें समझ नहीं पाते।

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चिड़िया-सी उड़ान

मैं फिर से बच्ची बनना चाहती हूँ — बिना डर, बिना संकोच। खुलकर हँसना-रोना, बारिश में भीगना और सिर्फ माँ-पापा के दुलार में खो जाना। दुनिया की सोच से परे, कुछ पल के लिए सिर्फ अपने होने को जीना चाहती हूँ।”

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