बस अब और नहीं 

मंजू शर्मा मनस्विनी, प्रसिद्ध लेखिका, भुवनेश्‍वर

सान्वी ने सुबह के सारे कामों से निवृत्त होकर अपने लिए एक कड़क-सी चाय बनाई और कप लेकर बालकनी में जा बैठी। बारिश की रिमझिम कई दिनों से लगातार चल रही थी, लेकिन आज तो जैसे बूंदें खिड़कियों से टकराकर भीतर झांकने की जिद पर उतर आई थीं। सान्वी वहीं रखी कुर्सी पर बैठकर इन नजारों को निहारने लगी। हवा के साथ लहराती, बलखाती बूँदें जैसे किसी तूफान से जूझ रही थीं।
इन्हें देख सान्वी सोचने लगी—पुल्लिंग संज्ञा स्त्रीलिंग पर हमेशा भारी क्यों पड़ती है?
आखिर क्या सोचकर ऐसा नियम बनाया गया इस समाज ने,और भगवान ने, जो स्त्री किसी भी रूप में मजबूत होते हुए भी बार-बार कमजोर पड़ जाती है?यही सोचते-सोचते उसका मन अतीत के पन्नों को पलटने लगा। उसने भी तो अनगिनत तूफ़ानों का सामना किया है। छह-सात वर्षों के उस संघर्षशील दशक में हर दिन एक युद्ध चलता रहा. कभी कमापोष का, कभी शब्दों के तीखे प्रहारों का,तो कभी इस देह रूपी चमड़ी पर पड़ती चोटों का।एक युद्ध निरंतर चलता रहा अंतर्मन में, अनेक प्रश्नों का हल माँगता… कभी खुद से, कभी खुदा से… बिना कोई समाधान के बस जूझती रही जिंदगी। इस इंतजार में कभी तो ये युद्ध रुक सकता था कुछ क्षणों के लिए।कभी भरोसे के रिश्तों को नवपल्लव-सा सींचा,तो कभी उम्मीद की रोशनी में आँखें पथराईं।लेकिन हर बार सिर्फ निराशा ही नजर आई।
मौत से बदतर मंजरों को झेलते-झेलते, उसे खुद से ही आत्मग्लानि होने लगी—काश! समय पर विवेक का उपयोग किया होता,तो शायद ये युद्ध थम सकता था। बलिदान उन पलों का व्यर्थ-सा नजर आया। आश्चर्य भीतर तब न समाया।साथ रहते बरसों के रिश्तों में रत्ती भर भी प्रेम नजर नहीं आया।तब लगा—”जिंदगी जैसे राख हो गई…”बस, गर्दिश में टिमटिमाते कुछ सितारों की उम्मीद के साथ…वो उठ खड़ी हुई। उसी क्षण, थमती बारिश के साथ…उसके भीतर का तूफ़ान भयानक रूप ले चुका था।एक कठोर निर्णय के साथ—”बस, अब और नहीं!”
अब इस अनवरत युद्ध को विराम देना होगा।कभी सूक्ष्म, कभी तीव्र गति से चलती सांसों ने
आज खुद को थामने का साहस कर लिया था।चार-दीवारी में बंद, दरवाजों के पीछे पलते उस मौन युद्ध कोअब सान्वी अपने अंतर्मन की बोझिल सतह पर पूर्णतः जीत लेने को तैयार थी।

4 thoughts on “बस अब और नहीं 

  1. समाज शशक्त स्त्री को कभी भी पसंद नहीं करता है🙏

  2. नारी संघर्ष और सक्षमता की बहुत सुंदर कहानी।👌🙏

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