मासूम सपने

मधु झुनझुनवाला, प्रसिद्ध लेखिका, जयपुर

आज अष्टमी में कन्या पूजन के लिए गिन्नी को भी चाची ने बुलाया था। माँ चाची की मदद कर रही थीं, इसलिए गिन्नी और सक्षम को खेलने का समय मिल गया था। बगैर किसी कारण के चाची के आँगन में आने की हिम्मत गिन्नी की विधवा माँ में नहीं थी।”सुनो गिन्नी, तुम रोज क्यों नहीं आती हो मेरे साथ खेलने? मुझे तुम्हारे साथ खेलना बड़ा अच्छा लगता है।” – सक्षम ने बड़े ही अनुग्रह के साथ गिन्नी से कहा।”तुमको तो पढ़-लिखकर बड़ा अफसर बनना है। मेरे साथ खेलोगे तो फिर पढ़ाई कैसे होगी।” – गिन्नी ने न चाहते हुए भी अपनी चाची की कही हुई बात दोहरा दी।

“क्या तुम नहीं पढ़ोगी…? तुम्हें बड़ा नहीं बनना है?” – बहुत प्यार से नन्हें मासूम ने पूछा।”अरे मैं पास वाली स्कूल में जाती हूँ। पढ़ना भी अच्छा लगता है, पर माँ कहती हैं लड़कियाँ ज्यादा नहीं पढ़तीं, उन्हें बस घर के काम आने चाहिए।” – गिन्नी ने उदास मन से कहा।”सक्षम, काश मैं भी चिड़िया की तरह उड़ सकती। तो पापा को ढूँढकर घर वापस ले आती। माँ कहती हैं वो ऊपर आकाश में रहते हैं।”

“तुम परेशान नहीं होना, मैं ताऊजी को ढूँढ लाऊँगा ऊपर जाकर। एक बार मुझे बड़ा होने तो दो।”

“नहीं भैया… तुम्हें नहीं जाने दूँगी… गुम हो जाते हैं वहाँ सब लोग। यहाँ तो आस-पास रहते हैं, मिल भी लेते हैं।” – गिन्नी ने सहमते हुए कहा।”गिन्नी… गिन्नी… क्या सीखा रही हो तुम सक्षम को?” – चाची की चीखती हुई आवाज ने दोनों भाई-बहन को चौंका दिया।

“कुछ नहीं, चाची…” – काँप गई गिन्नी।

गिन्नी की आँखों में मोती चमकने लगे। सपने देखे भी नहीं और बिखर गए।

4 thoughts on “मासूम सपने

  1. मेरी रचना को स्थान देने के लिए धन्यवाद सुरेश जी 🙏🏻

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