कुछ नजारे ऐसे…

ज्योति सोनी, प्रसिद्ध लेखिका, अलवर

कुछ नज़ारे ऐसे होते हैं,
ज़िंदगी समेटे हुए।
फिर आते नहीं वापस,
मगर दिखते नहीं जाते हुए।

कुछ नज़ारे प्रेम-रस के बादल,
कर रहे मन-भँवर को पागल।
यादों के अंबर के पाखी,
लौटा लाओ दिन वो रातें।

कुछ नज़ारे आँखों का काजल,
मन में खिलते फूलों का डोला।
खुशबू रंग-बिरंगी फैलाए,
कुछ नज़ारे जब याद आ जाएँ,
जीवनभर को महकाते रहते।
एक मुस्कान-सी लाएँ,
अपना संग है कोई प्यारा,
चलो ज़िंदगी जी के दिखाएँ।

कुछ नज़ारे पाँव की पायल,
जब छनके तब लहराता आँचल।
जीवन को समेट के लाएँ,
कुछ नज़ारे मन को भाएँ।

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