कुछ नजारे ऐसे…

कुछ नज़ारे ऐसे होते हैं जो पूरी ज़िंदगी को समेटे रहते हैं। वे लौटकर फिर कभी नहीं आते, लेकिन जाते हुए भी दिखाई नहीं देते। कभी वे प्रेम-रस से भरे बादलों की तरह मन के भँवर को पागल बना देते हैं, तो कभी यादों के आकाश में उड़ते पंछियों की तरह हमें बीते दिन और रातें लौटा लाने को मजबूर करते हैं।

कुछ नज़ारे आँखों के काजल जैसे होते हैं, जो मन में फूलों की डोली सजा देते हैं और अपनी रंग-बिरंगी खुशबू से जीवन भर को महका जाते हैं। जब वे याद आते हैं, तो चेहरे पर एक मुस्कान ले आते हैं और यह अहसास कराते हैं कि जीवन में कोई प्यारा साथ है, जिसके साथ ज़िंदगी जीने लायक बनती है।

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खयालों की दहलीज पर…

बड़े अदब के साथ अल्फाज़ खड़े हैं, खयालों की दहलीज पर। मौन से हारे हुए हुड़दंग भीतर ही भीतर मच रहे हैं। जज़्बातों से सराबोर, अल्फाज़ मचल तो रहे हैं, पर तमीज़ ने उन्हें रोक रखा है, इस तरह कि वे सरेआम बाहर नहीं आ पा रहे।इसलिए बेचारे अल्फाज़ सहम गए हैं, किसी नकाबपोश औरत की तरह। अब उन्होंने अपने अभिव्यक्ति का एक जरिया ढूंढ लिया है। इसी वजह से आजकल उनकी आंखें भी बोलने लगी हैं—वो भी, अल्फाज़ों के परे।

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 हिंदी : हिंद देश का हृदय स्पंदन 

हिंदी हिंद देश का हृदय है। यह केवल एक भाषा नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा और अस्मिता का ध्वज है। पौराणिक ग्रंथों की महिमा, संतों की वाणी और क्रांति के स्वर सभी हिंदी में गूँजते हैं। मां की लोरी-सी निर्मल और सभी रसों की खान यह भाषा राष्ट्र की आत्मा को स्पंदित करती है। कबीर, तुलसी, सूर, जायसी और मीरा की भक्ति की छवि इसमें झलकती है। यही कारण है कि हिंदी हमारी आन-बान-शान ही नहीं, बल्कि भारत का अभिमान है। हमें इसे केवल राजभाषा ही नहीं, बल्कि राष्ट्रभाषा का सम्मान देना चाहिए।

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खंडहर महल

कभी ये महल रोशनी और रौनक से भरे रहते थे। उनकी दीवारों पर तस्वीरें मुस्कुराती थीं और झरोखों से सपनों की हवाएँ बहती थीं। लेकिन आज वही महल खामोश और वीरान खड़े हैं। उनकी दरारों में घास उग आई है और सन्नाटा इतना गहरा है कि बस हवा की गूंज सुनाई देती है, जैसे वक्त सब कुछ चुपचाप चुरा ले गया हो। जहाँ कभी कदमों की आहट और राग–रंग की महफ़िलें सजती थीं, वहाँ अब धूल और पत्थरों की चादर बिछी है। ये खंडहर सिर्फ टूटे पत्थर नहीं, बल्कि समय के साक्षी हैं, जो बताते हैं कि वैभव मिट जाता है, पर इतिहास हमेशा जीवित रहता है।

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पलाश के सामने एक खिड़की

नगर-सीमान्त पर जहाँ मेरा बसेरा है, उसके ठीक सामने पलाश का एक पेड़ है… जब से उस पर पलाश के अंगारे खिले हैं, मन शरविद्ध हरिण की भाँति बार-बार वहीं चला जाता है। जैसे फूल रौशनी हों। और फूलों का न होना रात्रितिमिर, जिसमें पेड़ आँख से ओझल हो जाएं… वसंत से बड़ा निर्मोही कौन है?

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