सूखती नदी, पहाड़ों और चंद्रमा के बीच मौन खड़ा एक चिंतनशील व्यक्ति, जो समाज की आंतरिक विसंगतियों को देख रहा है।

वातावरण

यह कविता प्रकृति की स्थिरता और मनुष्य की कृत्रिमता के बीच के गहरे विरोधाभास को उजागर करती है। हँसी के पीछे छिपी पीड़ा, अभिनय और आंतरिक तनाव को रेखांकित करती यह रचना मौन की उस शक्ति को सामने लाती है, जो कभी-कभी शब्दों से कहीं अधिक मुखर होती है।

Read More

बस अब और नहीं 

सान्वी ने सुबह की सारी व्यस्तताओं से निवृत्त होकर बालकनी में बैठकर बारिश की बूंदों को निहारना शुरू किया। उसी समय उसके भीतर लंबे समय से चल रहे संघर्ष और आंतरिक तूफ़ान ने नया रूप ले लिया। अतीत के घाव, निराशा और खुद से होने वाली आत्मग्लानि ने उसे झकझोर दिया। और तभी उसने ठान लिया. बस, अब और नहीं!”उसने अपने अनवरत युद्ध को विराम देने का साहस जुटाया, और अपने अंतर्मन पर पूर्ण नियंत्रण पाकर आत्मा की जीत का अनुभव किया।

Read More
रेलवे पटरी के पास खड़ी एक महिला, जो दूर खेतों की ओर देख रही है अकेलेपन और आज़ादी की चाह का प्रतीक

उस दोपहर..

कभी-कभी जीवन में सबसे बड़ा संघर्ष बाहर की दुनिया से नहीं, बल्कि अपने भीतर के खालीपन से होता है। “पटरी के उस पार” एक ऐसी ही कहानी है, जो एक नवविवाहिता के मन के उस सूनेपन को उजागर करती है, जिसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं होता।

Read More