स्वतंत्र और आत्मविश्वासी भारतीय महिला नारी अधिकार और समानता का प्रतीक बनकर खड़ी

मैं नारी हूँ जागीर नहीं

यह कविता नारी की स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और अधिकारों की बुलंद आवाज़ है। समाज में स्त्री को जागीर समझने की मानसिकता पर तीखा प्रहार करती यह रचना समानता और सम्मान की माँग करती है।

Read More

चुप्पी में दर्ज एक स्त्री

स्त्री के उस अनकहे इतिहास की साक्षी है, जिसे वह नीले निशानों, झुकी आँखों और मौन सहमति के बीच ढोती रहती है। पिता से पति तक, देह से धर्म तक, वह हर भूमिका निभाती हुई अपनी इच्छाओं को अवर्जित कर देती है। अहिल्या, द्रौपदी, उर्मिला और सीता की तरह वह सदियों से अग्नि-परीक्षाओं में झोंकी जाती है फिर भी सृजन करती है, सहती है और अंत तक एक अभेद रहस्य बनी रहती है

Read More

माँ जैसी नहीं हूं मैं…

यह कविता एक आत्मस्वीकृति है — एक बेटी की अपनी माँ के प्रति संवेदनाओं, निरीक्षणों और अनुभवों की गहराई से उपजी भावनाओं की अभिव्यक्ति। वह कहती है कि वह अपनी माँ की खामोशी पढ़ लिया करती थी, माँ के संघर्षों और त्याग की साक्षी रही है। माँ की आँखों में छिपे दर्द, जीवन की कठोर सच्चाइयों से संघर्ष, और अपनी इच्छाओं को निस्वार्थ भाव से दबा देने का दृश्य उसने बार-बार देखा।

वह माँ की हर वह चुप्पी पहचानती थी, जिसे दुनिया अनदेखा कर देती है। माँ के आँचल से आँसू पोछने से लेकर, चाँदनी रातों में अपने दुखों से बात करने तक की हर एक लम्हा, बेटी के मन में गहरे बैठ गया।

Read More

“जहां से मैं शुरू हुई, वहां मैं नहीं रुकी”

प्रभा ने जीवन भर त्याग और समर्पण सीखा, लेकिन जब अपनी बेटी की बातों ने उसे आईना दिखाया, तो उसने खुद के अस्तित्व की तलाश शुरू की। आज, वह सिर्फ किसी की पत्नी या बहू नहीं, बल्कि एक शिक्षिका, एक मार्गदर्शक और एक सफल स्त्री है — अपनी पहचान के साथ।”

Read More