
सुरभि, प्रसिद्ध लेखिका, दुर्ग
तुम सपने ज़रूर देखना
इसलिए नहीं कि मैंने कहा है,
और न इसलिए कि मैं
उन सपनों का हिस्सा बन सकूँ.
सपने इसलिए देखना
ताकि उन्हें सच करने से पहले
उन्हें गति दे सको,
और उस राह में
मुझे धीरे-धीरे भूल जाओ.
तुम माँ के सपने देखना,
जहाँ प्रतीक्षा की आँखों में
पीड़ा की नमी न हो.
जहाँ वह अपलक तुम्हें निहारे,
और उसका हर देखना
आशीर्वाद बन जाए.
वह निवाला देखना
जिसे माँ ने अपने हिस्से से
तुम्हारे लिए बचाया था.
वह गोद देखना
जिससे तुम आज दूर हो,
और वह स्पर्श याद करना
जिसने बुखार की तपिश
एक पल में उतार दी थी.
यह महानगर की गरमाहट
उस स्नेह का विकल्प नहीं,
जो ओस की बूंदों में
घर की खुशबू समेट लेता है.
यहाँ खुद को तलाशते-तलाशते
हर दिन
थोड़ा और अकेले हो जाना
सपनों की कीमत नहीं होनी चाहिए.
तुम सपने ज़रूर देखना,
अपनी आँखों से नहीं,
माँ की दृष्टि से.
क्योंकि हक मेरा नहीं,
माँ का है
कि वह तुममें
एक बार फिर
साँस ले सके.

बहुत सुंदर और हर मां का सच ।
सपने देखना , बच्चों को उत्साहित करना और उनका घर छोड़कर जाना सब अनिवार्य हो जाता है । इस उन्नति में भागीदारी हंसते हुए करना सम्भव है , सबकी खुशी के लिए ।
यह सब जीवन का अभिन्न अंग है। अपने मन की
शक्ति का सदुपयोग करें ।
बहुत सुंदर और हर मां का सच ।
सपने देखना , बच्चों को उत्साहित करना और उनका घर छोड़कर जाना सब अनिवार्य हो जाता है । इस उन्नति में भागीदारी हंसते हुए करना सम्भव है , सबकी खुशी के लिए ।
यह सब जीवन का अभिन्न अंग है। अपने मन की
शक्ति का सदुपयोग करें ।
सुंदर रचना
सच कहा माता-पिता की कद्र और उनकी स्नेह,ममता कभी नहीं भूलनी चाहिए ।उन्हे सदैव अपने हृदय में और कार्य में जीवित रखना चाहिए साधुवाद