कृष्ण और कृष्ण प्रिया

वह स्वयं को हर रूप में देखता है वामन, नरसिंह, माधव, नंदलाल एक ही सत्ता, अनेक लीलाएँ। और उसके सामने खड़ी है ‘कृष्ण प्रिया’, जिसकी पहचान केवल उसकी भक्ति है। ग्वालिन के वेश में, आँखों में प्रेम और अधरों पर पुकार लिए, वह बस इतना चाहती है कि कृष्ण नाम में खो जाए। उसके लिए वही तिलक है, वही श्रृंगार, वही जीवन। अंत में उसकी एक ही विनती रह जाती है. “जब मैं कहूँ… आओ न स्वामी, तो तुम आ जाना।”

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बहुत जी करता है

मैं जीना चाहती हूँ उन क्षणों को जब ब्रज में कृष्ण अपनी लीलाएँ रचते थे। नटनगर रास, बंसी की मधुर तान, गोपियों की हँसी और उनका अनन्य प्रेम—हर दृश्य हृदय में जीवंत हो उठता है। मैं देखना चाहती हूँ यशोदा मैया का लाल संग खेलना, सुदामा का स्नेह, और कान्हा की माखन चोरी। कभी-कभी लगता है कि यह भाव किसी पुराने युग की स्मृति है—शायद मैं भी कोई गोपी थी या ललिता जैसी सखी। मैं रुक्मिणी नहीं, बल्कि मीरा का विरह, राधा का अनन्य प्रेम और ब्रज की होली का उल्लास जीना चाहती हूँ।कृष्ण बनना सरल नहीं, पर उनके प्रेम में खो जाना—यही सबसे बड़ा सुख है।

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जब स्त्री प्रेम करती है….

वो सीता की तरह अग्नि परीक्षा देती है, उर्मिला की तरह प्रतीक्षा करती है, राधा की तरह वियोग को स्वीकारती है, और मीरा की तरह प्रेम में ज़हर भी अमृत मान लेती है। स्त्री का प्रेम त्याग है, मौन की पुकार है, और एक सम्पूर्ण सृष्टि है — जिसे समझने के लिए साधक बनना पड़ता है।

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