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कभी मैं याद आऊँ… तो चले आना

कभी…
जब रात कुछ ज़्यादा भारी लगे,
और नींद आंखों से पहले मन को छोड़ दे
तो बस उसी खालीपन में
अगर मेरा नाम गूंज जाए तुम्हारे ज़ेहन में,
तो चले आना…
ना कोई पश्चाताप लेकर,
ना पुरानी बातों का हिसाब लिए,
बस ख़ामोशी में लिपटे हुए
थोड़े थके से
जैसे परिंदे लौटते हैं अपने घोंसलों में।
जब बारिश ज़्यादा गीली लगे,
और तुम्हें भीगने से ज़्यादा
किसी की बातों में घुल जाने का मन हो
तो चले आना…
मैं अब भी वही हूँ
जहाँ मैंने तुम्हें जाने दिया था।
कभी मेरी हँसी याद आए,
तो थोड़ा ठहर कर हंस लेना,
और अगर कभी
उस हँसी के पीछे का मौन सुन सको
तो जान लेना…
कि मैं अब भी तुम्हें पुकारती हूँ
उन्हीं सपनों में
जहां तुम मुझे अक्सर मिला करते थे।
कभी मैं याद आऊ
तो दिल से सवाल मत करना —
कि क्यूँ, कब, कैसे?
क्योंकि कुछ यादें
उत्तर नहीं होतीं,
बस प्रार्थनाएँ होती हैं
जो मन की चौखट पर दीप सा जलती हैं।
तो अगर कभी…
किसी सुबह की पहली किरण की तरह
मेरा नाम तुम्हारे भीतर उग आए,
तो चले आना…
मैं कुछ नहीं पूछूँगी
बस तुम्हारे आने की आहट
मन के किसी कौने में सम्भाल कर रख दूँगी,
और तुम देखना…
मेरे खामोश चेहरे पर लौटती मुस्कुराहटें।
कभी मैं याद आऊँ… तो चले आना।
पर आना उसी ख़ामोशी के साथ
जो मुझे पहली बार तुम्हारे चेहरे पर दिखी थी।

गरिमा भाटी “गौरी” फ़रीदाबाद, हरियाणा

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