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“शाम के धुंधले माहौल में अकेला शख्स इश्क़ के ख्यालों में डूबा हुआ”

इब्तिदा-ए-इश्क

इश्क़ एक ऐसा एहसास है जो शब्दों से परे होते हुए भी कविता में सबसे खूबसूरत ढंग से व्यक्त होता है। “इब्तिदा-ए-इश्क” इसी एहसास की एक झलक है, जहाँ अधूरापन भी एक मुकम्मल कहानी का हिस्सा बन जाता है।

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कभी मैं याद आऊँ… तो चले आना

कभी-कभी कुछ यादें सिर्फ प्रश्न नहीं होतीं, वे उत्तर भी नहीं होतीं—वे प्रार्थनाओं जैसी होती हैं, जो किसी के दिल की दहलीज़ पर दीप की तरह जलती रहती हैं। यह कविता नहीं, बल्कि प्रेम की उस शांत पुकार का दस्तावेज़ है जो बिना किसी आरोप या उत्तरदायित्व के, बस यादों की नम परतों में छुपा होता है। जब भी मन थक जाए, कोई मुस्कान याद आ जाए, या बारिश में घुलने की इच्छा हो, तब लौट आने की स्वीकृति देने वाली यह पुकार, प्रेम की सबसे कोमल और निस्वार्थ अभिव्यक्ति है। प्रेम, जहाँ आना जाना नहीं, बस “होना” ही काफ़ी होता है।

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