जब दो अधूरे मिलकर एक सम्पूर्ण एहसास बन जाते हैं

दिव्या सक्सेना, इंदौर
पसार देना उस दर्द को
अपने दिल से निकालकर
मुझे तक
भीगने देना मुझे भी
तुम्हारे साथ साथ
एक अनकही दास्तां को याद करके
जब डुबकी लगाऊं गहराई में
तुम्हारा हाथ थामें
तो मुस्कुरा जाना तुम भी
चुपके से
शब्दों का आभाव
तथा मौन की प्रखरता में
हम पाने लगते हैं खुद को
एक ही सूरत में
और लोग कहने लगे हैं
ये देखकर कि हम पूरक हैं
एक दूसरे के।
इन रचनाओं को भी पढ़ें और अपनी टिप्पणी दें-
“मन थके तो कौन?”
सही राह !
“जिद से पहचान”
वृंदावन की पुकार
इब्तिदा-ए-इश्क
आस्था एवं पूजा
