gulmohar

कभी मैं याद आऊँ… तो चले आना

कभी-कभी कुछ यादें सिर्फ प्रश्न नहीं होतीं, वे उत्तर भी नहीं होतीं—वे प्रार्थनाओं जैसी होती हैं, जो किसी के दिल की दहलीज़ पर दीप की तरह जलती रहती हैं। यह कविता नहीं, बल्कि प्रेम की उस शांत पुकार का दस्तावेज़ है जो बिना किसी आरोप या उत्तरदायित्व के, बस यादों की नम परतों में छुपा होता है। जब भी मन थक जाए, कोई मुस्कान याद आ जाए, या बारिश में घुलने की इच्छा हो, तब लौट आने की स्वीकृति देने वाली यह पुकार, प्रेम की सबसे कोमल और निस्वार्थ अभिव्यक्ति है। प्रेम, जहाँ आना जाना नहीं, बस “होना” ही काफ़ी होता है।

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“कभी तो आओ… फुर्सत के इतवार बनकर”

यह कविता एक गहरी प्रतीक्षा की पुकार है—जहाँ मन किसी के आगमन की राह देख रहा है, जो कभी फुर्सत, कभी मल्हार, कभी रंग और कभी आसुओं की धार बनकर आए। भावनाओं से सजी ये पंक्तियाँ एक ऐसी उपस्थिति की चाहत हैं, जो जीवन को फिर से स्पर्श करे, संगीतमय बनाए और रंगों से भर दे।

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