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जब स्त्री प्रेम करती है….

वो सीता की तरह अग्नि परीक्षा देती है, उर्मिला की तरह प्रतीक्षा करती है, राधा की तरह वियोग को स्वीकारती है, और मीरा की तरह प्रेम में ज़हर भी अमृत मान लेती है। स्त्री का प्रेम त्याग है, मौन की पुकार है, और एक सम्पूर्ण सृष्टि है — जिसे समझने के लिए साधक बनना पड़ता है।

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वे पुरानी सी प्रेमिकाएं…

यह कविता उन पुरानी प्रेमिकाओं और पत्नियों को समर्पित है जिन्हें पढ़ना-लिखना भले न आता हो, पर जिन्होंने प्रेम की सबसे सुंदर अभिव्यक्तियाँ रचीं — कभी गीली मिट्टी में पैर के अंगूठे से प्रेम-पत्र उकेरकर, तो कभी पलकों के इशारे से मन की बात कहकर। उनका प्रेम किताबों में नहीं, ज़मीन पर लिखा जाता था। आज की चिकनी टाइल्स और मार्बल की ज़मीन पर वो प्रेम-पत्र कहीं दबकर खो चुके हैं। इस निश्छल, मौन, पर गहरे प्रेम को समझने के लिए शायद हमें टाइम मशीन में लौटकर जाना होगा।

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प्रेम होने तो दो

प्रेम की कथा इतनी सरल नहीं कि शब्दों में बाँधी जा सके। “धरती सब मसि कियो, लेखनी सब बनराई”—यह यूँ ही नहीं लिखा गया। जब प्रेम को लिखना चाहा, तो लेखनी ने हार मान ली। उसमें धूल, राख और व्यापार की कठोरता निकल पड़ी। क्योंकि प्रेम में कोई सौदा नहीं होता, कोई मोल नहीं होता।

कभी प्रेम में एक महामौन था, जिसमें न मिलने का डर था, न खोने का भय। स्त्री अपने घर की नींव संभालने आई, पुरुष घर को भरने कमाने निकला। पर प्रेम की अनुगूँज बहती रही—नदियों में, झरनों में, लहरों में, हवाओं में… बिना कहे, बिना सुने।

जो प्रेम को अभिशाप कहकर कोसता है, वह भी जानता है कि प्रेम होना ही सबसे बड़ा वरदान है। लेकिन प्रेम करने से पहले, उसे समझना, महसूस करना, जीना आना चाहिए।

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