यादों की गलियों में लौट चलें
माँ के हाथों का स्वाद केवल भोजन का स्वाद नहीं, बल्कि ममता, त्याग और निस्वार्थ प्रेम की ऐसी विरासत है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे साथ चलती है।

माँ के हाथों का स्वाद केवल भोजन का स्वाद नहीं, बल्कि ममता, त्याग और निस्वार्थ प्रेम की ऐसी विरासत है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे साथ चलती है।
माँ केवल एक रिश्ता नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व की सबसे गहरी गूँज होती है। “हर हिस्से की गूँज है माँ” एक बेटी की भावुक स्मृतियों से बुना गया ऐसा संस्मरण है, जिसमें माँ के प्रेम, अनुशासन, त्याग, संवेदनाओं और बिछड़ने के दर्द को बेहद आत्मीयता से व्यक्त किया गया है। यह लेख हर उस व्यक्ति के दिल को छू जाएगा, जिसने अपनी माँ के स्नेह को महसूस किया है।
यह माँ के बिछड़ जाने के बाद भी हर याद, हर एहसास और हर छोटी चीज़ में उनकी मौजूदगी को महसूस करने की मार्मिक अनुभूति को शब्द देता है।
यह कविता माँ के साथ बिताए गए उन अनमोल पलों की स्मृतियों को सजीव करती है, जहाँ ममता, त्याग, अनुशासन और प्रेम की खुशबू हर शब्द में महसूस होती है।
इस कविता में एक संतान अपनी माँ की यादों और सीख को भावनात्मक रूप में संजोती है। माँ द्वारा दिए गए एक पुराने खत में छिपे भाव उसे आज भी संबल देते हैं। माँ की कही बातें, उसके एहसास, और उसका साथ — सब कुछ आज भी दिल की अलमारी में सजे हुए हैं। वह मानती है कि वह माँ जैसी नहीं बन सकी, लेकिन माँ से जीवन की सच्ची बातें सीखी हैं — मोहब्बत, यारी और कठिनाइयों में टूटे बिना जीना। उजालों की प्रतीक्षा में अंधेरों से जो उसने पाया, वो भी माँ की दी हुई रोशनी से ही संभव हो पाया।