माँ, तुम्हारी यादों को, बातों को
अपनी रंगत में उतार कर रखा है,
दिया है जो गुमनाम-सा लिफाफा —
आज भी दिल से लगा रखा है।
लिखा है जो उसमें तुमने,
अपना एहसास अब तक की उम्र का —
उसी एहसास में ख़ुद को
छुपा कर रखा है।
तुम न कहती थीं —
“टूट मत जाना,
जो दर्द मिले, तो हद से न गुजर जाना।”
आज उन्हीं बातों को साथ रखा है।
जो न पढ़ पाए कोई उस ख़त को,
दिल की अलमारी में सजा रखा है।
तुम-सा तो न बन पाई माँ, मगर —
तुमसे सीखा बहुत कुछ है।
सच है न माँ, उजालों के इंतज़ार में
अंधेरों में देखा बहुत कुछ है।
तुमसे ही तो सीखा है मोहब्बत,
तुमसे ही सीखी यारी हमने।
थाम कर हाथ, कलम चलाई हमने।

खुशी झा, प्रसिद्ध लेखिका, मुंबई
