“हर हिस्से की गूँज है माँ”

बालकनी में बैठी एक महिला अपनी दिवंगत माँ को याद करते हुए भावुक संस्मरण लिख रही है, पीछे रात का शांत वातावरण दिखाई दे रहा है।

विजया डालमिया, हैदराबाद

माँ” संसार का सबसे सुंदर और सबसे छोटा शब्द। मनुष्य की जुबान से निकलने वाली यह पहली आवाज़ होती है, जो तोतली भाषा में भी पूरी सहजता से उच्चरित हो जाती है। ममता और लाड़-दुलार की कोई भाषा नहीं होती। एक बच्चा अपनी माँ की धड़कनों में भी संगीत सुन लेता है। सृष्टि में माँ जैसा नैसर्गिक कलाकार दूसरा कोई नहीं। रोते हुए बच्चे को हँसाना, उसे बोलना-चलना सिखाना, रूठना और मनाना – यह सब माँ के सहज अभिनय का हिस्सा है। यह कला उसे किसी कार्यशाला में सीखने की आवश्यकता नहीं पड़ती; यह तो प्रकृति की अनुपम देन है।

“माँ” जब भावनाओं से जुड़ती है, तो आत्मा की गहराइयों तक उतर जाती है। यह छोटा-सा शब्द अपने भीतर पूरी कायनात समेटे हुए है। यूँ कहें कि एक तरफ पूरी दुनिया हो और दूसरी तरफ माँ, तब भी माँ का पलड़ा भारी ही रहेगा, क्योंकि वह अपने बच्चों के लिए सब कुछ न्योछावर कर देती है। वही हमें आकार, आचार और विचार देती है। हम सब अपनी माँ के ऋणी हैं और उनका यह ऋण कभी नहीं चुका सकते। हमारी नज़र उतारकर जो सिक्के उन्होंने गंगा मैया में प्रवाहित किए, वे सिक्के भी हम उन्हें कभी लौटा नहीं सकते।

1 नवंबर 1942 को छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में मेरी मम्मी का जन्म हुआ। वह दिन भी अत्यंत शुभ था – धनतेरस। नाना-नानी की सबसे बड़ी बेटी का नाम बड़े प्यार से “तुलसी” रखा गया। ग्यारह भाई-बहनों में सबसे अधिक कुशाग्र बुद्धि रखने वाली मेरी मम्मी का पालन-पोषण उस समय के हिसाब से अत्यंत लाड़-प्यार से हुआ। नानाजी सम्पन्न व्यक्ति थे और उन्होंने मम्मी को हमेशा हथेली पर रखकर पाला। मम्मी हर काम बड़ी मुस्तैदी से किया करती थीं। पढ़ाई में उनकी गहरी रुचि थी, किंतु दसवीं तक पहुँचते-पहुँचते उनका विवाह नागपुर के एक बड़े अग्रवाल परिवार में कर दिया गया।

संयुक्त मारवाड़ी परिवार में रहते हुए भी मम्मी हमेशा हमसे शुद्ध हिंदी में बात करती थीं। परिवार बड़ा था, इसलिए हमारा प्यार दादी, ताईजी और चाचीजी के बीच बँटता रहा। उस समय बड़ों के सामने बच्चों को खुलकर दुलारने का चलन भी नहीं था। इसलिए मम्मी कभी अपना स्नेह खुलकर जता नहीं पाईं और न ही हमें उनसे खुली प्रशंसा मिल पाई। फिर भी उनके हर जिक्र में हमारी चिंता और भलाई छिपी रहती थी। माँ बनने के बाद ही समझ आता है कि जीवन को सही दिशा देने के लिए माँ की फटकार भी उतनी ही आवश्यक होती है।

मम्मी बेहद समझदार, व्यवहार-कुशल, स्वाभिमानी और स्वावलंबी थीं। इतने बड़े परिवार में किसी भी गंभीर विषय पर उनकी राय सर्वोपरि मानी जाती थी। कशीदाकारी और बेलबूटों में उन्हें महारत हासिल थी। हम उनकी आँखों से डरते थे और वे अपनी माँ की आँखों से।

मुझे आज भी वह घटना याद है, जब मम्मी हमें फिल्म “राजा और रंक” दिखाने ले गई थीं और छोटा भाई नानी के पास रह गया था। उसके बहुत रोने पर घर लौटते ही नानी ने मम्मी को सबके सामने एक थप्पड़ मार दिया। हम बच्चे सहम गए थे। उस समय का अनुशासन ऐसा ही था। किंतु हमारी मम्मी हमारे साथ हमेशा दोस्त की तरह रहीं। हम उनसे हर बात साझा करते थे। हमारे मित्र भी कहा करते थे — “तुम्हारी मम्मी कितनी अच्छी बातें करती हैं।”

अक्सर हम माँ को महानता के ऐसे आदर्श फ्रेम में कैद कर देते हैं कि उसकी चंचलता, उसकी संवेदनाएँ और उसका व्यक्तित्व देख ही नहीं पाते। एक बार मैंने उनकी सभी सहेलियों को घर बुलाया। उस दिन मैंने पहली बार अपनी माँ के भीतर छिपी उस चुलबुली लड़की को देखा, जो उम्र के इस पड़ाव पर भी दिल से उतनी ही जीवंत थी।

मम्मी को पढ़ने का बहुत शौक था। अखबार हो या पत्रिका, बिना पढ़े वे कभी नहीं सोती थीं। आज लिखते समय बार-बार यही विचार आता है कि यदि वे होतीं, तो कितने प्रेम से मुझे पढ़तीं।

2021 में कोरोना की दूसरी लहर ने हमारी दुनिया सूनी कर दी। माँ अब तारा बन चुकी हैं। वे अब आशीर्वाद बनकर मेरी लेखनी में चमकती हैं। उनके जाने के बाद मैंने उनसे संवाद करने के लिए “पाती” लिखनी शुरू की। यह हर उस संतान की आवाज़ है, जिसकी माँ उसे छोड़कर चली गई। जब तक मम्मी थीं, कभी कह नहीं पाए – “मम्मी, लव यू।” किंतु आज हमारे हर हिस्से की गूँज यही कहती है –
“मम्मी… लव यू… मिस यू…”

2 thoughts on ““हर हिस्से की गूँज है माँ”

  1. बहुत सुंदर 👌
    मां जैसा इस दुनिया में कोई नहीं

  2. एक लेखिका का स्वप्न होता है कि वह अपनी जन्मदायिनी के लिये लिख कर अपने प्रेमिल शब्दों की श्रद्धांजलि अपनी माँ को अर्पित करे और आपने अपने लेख में उस स्वप्न के साथ संपूर्ण न्याय किया है आपकी लेखनी को शत शत नमन हार्दिक बधाई 🌹🌹

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