खबर में ड्रामा और पत्रकारिता का मापन तय हो : त्रिवेदी

भारत भवन में पत्रकारिता और मीडिया के मुद्दों पर चर्चा करते वरिष्ठ पत्रकारों की परिचर्चा।

मीडिया में बढ़ती मठाधीशी और पेड न्यूज पत्रकारिता के भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा है : अनिल पांडेय

ख्वाहिशों को खबर मत बनने दें : राशिद किदवई

बायलाइन की कसौटी मौलिकता है : शरद गुप्ता

सिर्फ कंटेंट बनाए नहीं, उसकी मौलिकता पर भी ध्यान दे : अनुज खरे

रिपोर्ट : अभिराज मिश्रा, सृष्टि कुमारी, रोहित तिवारी

पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग तीन दशक से सक्रिय और न्यूज-18 के वरिष्ठ संपादक श्री प्रतीक त्रिवेदी ने हिंदी पत्रकारिता के पूर्ण हो रहे 200 वर्ष पर भारत भवन में आयोजित ‘प्रणाम उदन्त मार्तण्ड’ के अंतर्गत ‘आत्मावलोकन और संकल्प’ विषय पर आयोजित परिचर्चा ने कहा कि पत्रकारिता में स्पष्ट और कम बोलना तथा अपने बनाये नियम का पालन करना बहुत जरूरी है। उन्होंने बताया कि पत्रकारिता में खबरों की प्रस्तुति और बॉडी लैंग्वेज बहुत ही महत्वपूर्ण है। टेलीविज़न में लोगों के ड्रामा चाहिए होता है, परंतु खबर में कितन ड्रामा का तड़का और उसमें कितनी पत्रकारिता रहेगी, यह जानना बहुत महत्वपूर्ण है।

संपादक के पद की गरिमा और शक्ति पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि यह पद बहुत ही महत्वपूर्ण है, संपादकों के पास शक्ति होनी चाहिए पर इतनी नहीं की वे मठाधीश बन जाएं। अगर आपके पास ऑब्जर्वेशन करने की कला है तो आप कोई भी काम बहुत सलीके से कर सकते हैं। उन्होंने टेलीवीज़न में महत्व को बताते हुए कहा कि टेलीविज़न सरल से सरलता होने का साधन है। उन्होंने कहा कि वर्तमान पीढ़ी बहुत समझदार है और यह जब लड़खड़ाएंगे, गिरेंगे तब स्वयं ही सीख जाएंगे।

वरिष्ठ पत्रकार श्री अनिल पांडेय ने कहा कि डिजिटल पत्रकारिता में एक हिस्सा पूरी तरह पेड न्यूज से प्रभावित है। आज से 10-15 वर्ष पहले जब पेड न्यूज के खतरे की बात हो रही थी, वह अब बड़े रूप में दिख रहा है। हम सबको यह प्रयास करना चाहिए कि पेड न्यूज़ के खतरे को कैसे दूर किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि तीसरे प्रेस आयोग (मीडिया आयोग) की आज आवश्यकता है। यह तय करने का समय आ गया है कि पत्रकार कौन है, यह परिभाषित हो।

वरिष्ठ पत्रकार श्री अनुज खरे ने कहा कि आपके बनाए कंटेंट को गूगल और मेटा जैसी बड़ी मीडिया टेक कंपनी दर्शकों/पाठकों तक पहुंचा रहीं हैं। उन्होंने कहा कि एआई कंटेंट के समय में भी मौलिक कंटेंट की आवश्यकता और महत्व बहुत अधिक है। कंटेंट बनाने वालों को आत्मावलोकन करना चाहिए कि वे क्या कंटेंट बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि डिजिटल मीडिया का मार्केट 83 हजार करोड़ रुपये का है, जिसमें से 3000 करोड़ रुपये का मार्केट ही न्यूज़ के पास है।

उन्होंने बताया कि ऑस्ट्रेलिया में यह कानून है कि आप किसी वेबसाइट से कंटेंट लेते हैं तो उसका भुगतान करना होगा। वहां की सरकार ने इसकी मॉनिटरिंग की व्यवस्था बनाई है लेकिन हमारे यहां ऐसी व्यवस्था नहीं है।

श्री खरे ने कहा कि आज मोबाइल कैमरे से बड़ी मात्रा में कंटेंट बनाया जा रहा है, लेकिन उसमें गहराई और आत्मविश्लेषण की कमी दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि “सिर्फ कंटेंट बना देना पत्रकारिता नहीं है, उसमें दृष्टि और गंभीरता भी जरूरी है।” एआई तकनीक के बढ़ते प्रभाव पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि एआई के आने के बाद संपादक की आर्थिक स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो गई है।

वरिष्ठ पत्रकार श्री शरद गुप्ता ने कहा कि मौलिक होना सबसे जरूरी है। किसी भी रिपोर्टर के लिए बाइलाइन बहुत महत्व रखती है, जो उसे मौलिक और अच्छे समाचार पर ही मिलती है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को उन्होंने अपने ही पोर्टल इंडियन मास्टर माइंड्स के इंटर्नशिप का मौका देने की बात कही।

वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक श्री राशिद किदवई ने कहा कि हम पत्रकारों को अपना आत्मावलोकन करना चाहिए। जब हम अपनी ख्वाहिश को खबर का रंग देते हैं तो हमारे गलत होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। हमें याद रखना चाहिए कि हम जो चाहते हैं, वैसे सारा समाज नहीं सोचता है। चुनाव परिणामों पर इसलिए भी पत्रकारों के विश्लेषण गलत निकल रहे हैं क्योंकि उनके विचार उनके विश्लेषण पर हावी हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि मनुष्य के अनुभव का विकल्प एआई में नहीं मिल सकता। जो कंटेंट एक पत्रकार अपने अवलोकन और अनुभव से लेकर आता है, वह एआई कहाँ से लाएगा क्योंकि एआई वही कंटेंट दे सकता है जो इन्टरनेट पर उपलब्ध है।

फोटो : आदित्य कुमार चौरसिया

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