दर्द-ए-मोहब्बत

बारिश भरी रात में खिड़की के पास बैठा एक उदास व्यक्ति, जो मोहब्बत की यादों में खोया हुआ है।

डॉ. अनामिका दुबे निधि, मुंबई

हुआ ऐसा कि मोहब्बत भी बोझ लगती है,
कोई गर ज़िक्र भी करे तो जान जलती है।

कैसे मैं हाल-ए-दिल बयान करूँ, बताओ ना,
मैं जो चाहूँ भी तो ये ज़ुबान न खुलती है।

वो जो कहते थे कि हर दम ही निभाएँगे साथ,
आज उनकी ही वफ़ा आँख में खलती है।

दिल के आँगन में अजब-सी ये वीरानी है,
हर कली जैसे बिना मौसम ही मुरझाती है।

मैंने हर दर्द को चुपचाप ही सीने में रखा,
अब तो ख़ामोशी भी मुझसे सवाल करती है।

तेरी यादों का असर देख ज़रा ऐ हमदम,
हँसी होंठों पे सही, आँख मगर भरती है।

कभी सोचा न था यूँ टूट के बिखर जाऊँगा,
अब तो हर ख़्वाब की तस्वीर भी डरती है।

तेरे जाने का असर दिल पे कुछ ऐसा ठहरा,
हर खुशी दहलीज़ से आकर ही पलटती है।

जिसे चाहा था मैं रूह की गहराई से,
अब वही बात मेरे दिल को बहुत खलती है।

कितनी उम्मीद से हमने ये रिश्ता बाँधा था,
अब वही आस भी सीने में धुआँ करती है।

रात ढलती है तो तन्हाई बढ़ा देती है,
नींद आँखों से मेरी दूर ही रहती है।

तू नहीं पास तो क्या, तेरी कमी क्या कम है,
तेरी यादों की शमा रात भर जलती है।

जो उजालों का कभी सबब हुआ करते थे,
अब वही याद अँधेरों में बदलती है।

मैंने सीखा है तड़प कर भी मुस्कुराना अब,
ये अदा भी तो मेरे दर्द से पलती है।

“निधि” इस दर्द-ए-मोहब्बत का अजब किस्सा है,
हँसी लब पर ही सही, आँख मगर नम रहती है।

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