
अंजू निगम, लखनऊ
बहुत बेवक्त आकर ठहर जाते हैं
कुछ लफ़्ज़ जेहन में।
ये लफ़्ज़ असरदार होते हैं,
और दिमाग कहता है
इन पर बहुत तबीयत से
कुछ लिखा जा सकता है।
इन लफ़्ज़ों में सोज़ है,
सुकून है, सलाहियत है।
वह वक़्त बेवक्त होता है,
इसलिए हाथ थाम नहीं पाते
कलम के जिस्म को।
और वे ठहरे हुए लफ़्ज़
दफ़्न हो जाते हैं
अंतस की गहराई में,
कभी न मिलने के लिए।
