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भारत भवन में पत्रकारिता और मीडिया के मुद्दों पर चर्चा करते वरिष्ठ पत्रकारों की परिचर्चा।

खबर में ड्रामा और पत्रकारिता का मापन तय हो : त्रिवेदी

भारत भवन में आयोजित ‘प्रणाम उदन्त मार्तण्ड’ कार्यक्रम के अंतर्गत वरिष्ठ पत्रकारों ने पत्रकारिता के बदलते स्वरूप, पेड न्यूज, एआई, डिजिटल मीडिया और मौलिकता जैसे मुद्दों पर गंभीर विचार साझा किए। वक्ताओं ने पत्रकारिता में आत्मावलोकन और जिम्मेदारी को समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बताया।

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दो सितारों का मिलन…42 साल बाद

बयालीस साल बाद हुई यह मुलाकात सिर्फ दो पुराने साथियों के मिलने भर की नहीं थी, बल्कि उन दिनों की धड़कनों को फिर से जी लेने जैसा अनुभव थी। इंदौर की गलियों में साइकिल से खबरों की तलाश में दौड़ते हुए बिताए गए वे दिन यादों की परतों से झाँकने लगे — अनंत चतुर्दशी की रातें, दंगों के बीच रिपोर्टिंग की बेचैनी, और श्मशानघाटों से जुटाई गई खबरों की जिम्मेदारी।

रतलाम के घर में बैठे हुए, चाय की प्यालियों के बीच समय जैसे ठहर गया था। हम दोनों बीच-बीच में ठहाके लगाते, कभी पुराने नामों को याद करते और कभी आज की पत्रकारिता पर अफसोस जताते। प्रदीप जब अपनी खबरों के डिजिटलाईजेशन की बात कर रहे थे, तो मन में एक अजीब कसक उठी — कुछ चीज़ें वक्त के साथ सँभाल लेनी चाहिए थीं।

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सूखी और बंजर जमीन के बीच उजड़ा हुआ भारतीय गाँव और खामोश बैठे लोग

तीन शब्द

समाचार पत्र के आठवें पृष्ठ के एक छोटे से समाचार ने उसे हिला दिया “ गाँव बिकाऊ है “| उसने इन तीन शब्दों को कई – कई बार पढ़ा | सोचने लगा , आवश्यकता और सुख के साथ – साथ पशु – पक्षी और मनुष्य तो बिक ही रहे थे अब गाँव भी ..`..
अजीब सा लगा उसे | घबराहट सी हुई |उसने अपने बैग को उठा कर गले में डाला और बाइक निकाल जा पहुंचा उस गाँव जहां बड़े – बड़े समाचार – पत्रों , चैनल्स की गाड़ियां साथ ही सरकारी तंत्र और वसाइयों की भी गाड़ियाँ खड़ी थीं | कैमरे चमक रहे थे | दाम लग रहे थे …
पता है किसके ……धूल उड़ाती , दरारों पटी बंजर जमीन के … अपनी ही गहराई नापते कुओं के … घर मकानों के… कोई नहीं पूछ रहा था पशुओं को ? न ही वहाँ के लोगों को ?

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