कब आओगे तुम ?

खिड़की के पास बैठी एक भावुक महिला, बारिश और धुंधले आसमान के बीच किसी अपने के इंतज़ार में खोई हुई।

लक्ष्मी सिंह रूबी, जमशेदपुर

सुनो न…!
कब आओगे तुम?

लेकिन क्या तुम भी उन अपनों की तरह
मेरे हिस्से में
कुछ नए घाव, कुछ अधूरी रातें,
और थोड़ी-सी तन्हाई छोड़ जाने आओगे?

या फिर तुम
उस पहली बारिश जैसे होगे,
जो बिना कुछ कहे
सूखी धरती की प्यास समझ लेती है।

उस ठंडी हवा जैसे,
जो थके हुए मन को
धीरे से सहला जाती है।

क्या ऐसा नहीं हो सकता
कि तुम सबसे अलग निकलो,
इतने अलग
कि मेरे होंठों तक आने से पहले ही
मेरी खामोशियों का अर्थ पढ़ लो।

मेरी मुस्कुराहट के पीछे छिपी
अनगिनत टूटी हुई साँसों को पहचान लो।

क्या ऐसा नहीं हो सकता
कि जब दुनिया मुझे
सिर्फ़ “ठीक हूँ” कहते सुनकर लौट जाए,
तुम मेरी आँखों में ठहरे
अनकहे दर्द को सुन लो।

मेरे मन में बरसों से
कुछ अधूरे ख्वाब पड़े हैं,
जैसे किसी बंद कमरे में
धूल से ढके हुए दीपक।

क्या तुम आकर
उनमें फिर से रोशनी जला दोगे?

क्या तुम मेरे जीवन में
ऐसे उतर सकते हो,
जैसे भोर उतरती है अँधेरी रात के बाद
धीरे… शांत…
पर पूरी दुनिया बदल देने वाली।

सुनो न…
अगर आना,
तो केवल साथ निभाने मत आना,
आना इस तरह
कि मेरी बिखरी हुई रूह को
एक घर मिल जाए।

आना ऐसे,
जैसे कोई दुआ
बरसों बाद कबूल होती है,
जैसे किसी थके मुसाफ़िर को
अचानक अपना शहर मिल जाता है।

और हाँ…
अगर कभी मेरा मन
बिना वजह उदास हो जाए,
तो मुझसे वजह मत पूछना,
बस मेरे पास बैठ जाना,
क्योंकि कुछ दर्द
शब्दों से नहीं,
सिर्फ़ एहसासों से समझे जाते हैं।।

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