कब आओगे तुम ?
यह रचना उस मन की आवाज़ है जो केवल साथ नहीं, बल्कि ऐसा प्रेम चाहता है जो खामोशियों को भी समझ सके और बिखरी हुई रूह को अपना घर दे सके।

यह रचना उस मन की आवाज़ है जो केवल साथ नहीं, बल्कि ऐसा प्रेम चाहता है जो खामोशियों को भी समझ सके और बिखरी हुई रूह को अपना घर दे सके।
हम सबके भीतर एक कोरा पन्ना होता है, जिस पर समय और अनुभव धीरे-धीरे अपने रंग भरते हैं। इन्हीं रंगों से जीवन की कहानी बनती है. कभी खुशी, कभी अधूरी इच्छाओं के साथ। अंततः यही भावनाएँ हमें एक ऐसी किताब में बदल देती हैं, जिसे हम जीते भी हैं और समझते भी हैं।