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हवा का झोंका

हवा का वह झोंका, जो अपना रास्ता भूलकर आँगन में आया, जैसे पूरी जगह को जीवित कर दिया। मैं चुपचाप एक कोने में खड़ी थी, पास वाले घर से प्रार्थना की धुन कानों में गूंज रही थी। ठंडी हवा, टिमटिमाता दिया, और सुगंधित समय सब मिलकर उस पल को शांति और प्रकाश से भर देते थे। हर लम्हा जैसे सपनों का गीत गा रहा हो, और मेरी आत्मा भी उसी संगीत में घुलमिल रही हो।

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समय बदला पर मेरी यादों का मेला नहीं

गोगापुर का मेला मेरे लिए केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि बचपन की वह दुनिया है जहाँ उत्साह, जिज्ञासा और अपनापन एक साथ साँस लेते थे। बैलगाड़ी में बैठकर मेले की ओर जाना, दाल-बाटी की खुशबू में भूख से ज़्यादा आनंद महसूस करना और ज़मीन पर बैठकर टूरिंग टॉकीज़ में फ़िल्म देखना ये सब मेरी स्मृतियों का हिस्सा बन गए। आज मेला भले ही बदल गया हो, पर मेरे भीतर वह अब भी वैसे ही जीवित है, जैसे समय ने उसे छुआ ही न हो।

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