रक्षा उपाध्याय, प्रसिद्ध लेखिका, इंदौर
अब बात नहीं करोगे…”
तुम्हारा यह वाक्य किसी फरमान की तरह था. सीधा, ठंडा और अंतिम।
हैरानी की बात यह रही कि न मुझे तकलीफ़ हुई, न शिकायत, न कोई आँसू गिरे।
मैं बस मुस्कुरा दी और कह दिया
“मत करना बात, मैं भी नहीं करूँगी।”
कहते हुए पल भर को रुकी,
और फिर खुद से ही पूछ बैठी—
क्या तुम जानते हो, यह बात तुम मुझसे कितनी बार पहले ही कर चुके थे?
मैं तुम्हारे पास होती थी,
और तुम हमेशा किसी और के साथ।
कभी टीवी की ख़बरों में उलझे,
कभी अख़बार की सुर्ख़ियों में खोए,
कभी मोबाइल की चमक में डूबे हुए।
मैं हर रोज़ तुम्हारा साथ माँगती थी
सिर्फ़ थोड़ी सी बात,
दो शब्द,
थोड़ा-सा ध्यान।
और तुम जवाब देते थे
“तो क्या, बात तो हो ही रही है।”
पर सच यह था कि बात मैं करती थी,
और तुम सिर्फ़ जवाब देते थे।
कितनी शामें मैंने तुम्हारे सामने बैठकर
इंतज़ार में गुज़ारीं
कि शायद आज तुम खुद से कुछ कहोगे,
दिल की कोई बात,
या बस इतना ही
“आज मन है कि तुम यहीं बैठो,
आज दुनिया से कोई वास्ता नहीं।”
ना टीवी,
ना अख़बार,
ना मोबाइल,
ना किसी और का ज़िक्र
बस हम।
लेकिन हर बार मैं खुद को समेटती रही,
चुपचाप उठती रही,
यह सोचकर कि
शायद तुम्हारे पास मुझसे कहने को
कुछ भी नहीं है।
मैं ही थी जो रास्ते ढूँढती रही
कभी पड़ोस की बातें,
कभी रिश्तेदारों के किस्से,
कभी अपनी ही बेवकूफ़ियों का सहारा लेकर
तुम्हें सुनने की कोशिश करती रही।
तुम्हारे महँगे तोहफ़े,
बड़े-बड़े रेस्टोरेंट,
और दिखावे की वह सारी सुविधाएँ
मेरे भीतर के खालीपन को
कभी भर नहीं पाईं।
मुझे बस भावनाएँ चाहिए थीं
एक कप चाय के साथ कुछ पल,
तुम्हारे कंधे पर सिर रखकर
आँखें मूँद लेने की इजाज़त,
बिना कुछ कहे
मेरी ख़ामोशी को सुन लेने की समझ।
लेकिन तुम कभी
मेरे साथ नहीं थे
मेरे पास नहीं थे।
हम एक ही छत के नीचे थे,
पर हमारे बीच की दूरियाँ
पाँच सौ किलोमीटर से कम नहीं थीं।
आज जब तुमने कहा
कि अब मुझसे बात नहीं करोगे,
तो सच कहूँ
मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा।
क्योंकि जिस दिन
तुमने सुनना छोड़ दिया था,
उसी दिन
हमारी बातचीत
ख़त्म हो चुकी थी।

बेहतरीन भाव । रक्षा जी,आप का लिखा दिल को छू जाता है
मैं हर रोज़ तुम्हारा साथ माँगती थी
सिर्फ़ थोड़ी सी बात,
दो शब्द,
थोड़ा-सा ध्यान।
और तुम जवाब देते थे
“तो क्या, बात तो हो ही रही है।”
आज जब तुमने कहा
कि अब मुझसे बात नहीं करोगे,
तो सच कहूँ
मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा।
बहुत मार्मिक सच्चाई का वर्णन
वह कोई घर बनाने वाली हो या कामगार या किसी आफिस में कार्यरत औरत
” बात खत्म ” के साथ , ” साथ ” कब छूट जाता है , पता नहीं चलता
हर मन की बात है ।
Thankyou so much madhu ji