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हवा का झोंका

हवा का वह झोंका, जो अपना रास्ता भूलकर आँगन में आया, जैसे पूरी जगह को जीवित कर दिया। मैं चुपचाप एक कोने में खड़ी थी, पास वाले घर से प्रार्थना की धुन कानों में गूंज रही थी। ठंडी हवा, टिमटिमाता दिया, और सुगंधित समय सब मिलकर उस पल को शांति और प्रकाश से भर देते थे। हर लम्हा जैसे सपनों का गीत गा रहा हो, और मेरी आत्मा भी उसी संगीत में घुलमिल रही हो।

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क्या मैं सही हूँ?

कभी-कभी मन स्वयं से प्रश्न करता है—क्या मैं सही हूँ? मेरे विचार, मेरे निर्णय और मेरे कदमों की दिशा क्या वास्तव में उस सत्य की ओर जा रहे हैं, जिसे मेरी अंतरात्मा पहचानती है? सही और गलत का पैमाना हमेशा दुनिया की नजरों से नहीं तय होता। लोग कभी सराहना करेंगे, तो कभी आलोचना भी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मेरी आत्मा भीतर से शांत है, क्या मेरी अंतरात्मा मुझे स्वीकार करती है। यदि उत्तर “हाँ” है, तो वही मेरा सही होना है, क्योंकि अंततः सही और गलत का असली निर्णय बाहर से नहीं, भीतर से आता है।

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